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मन की आध्यात्मिक मांग पूरी करें

8 वर्ष पहले
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हमारे शरीर में दस इंद्रियां होती हैं। मेडिकल साइंस भले ही इन्हें महत्व न दे, उसके पास शरीर की लगभग हर बीमारी का इलाज भी हो सकता है, लेकिन रोग की एक सीमा के बाद चिकित्सा विज्ञान कह देता है कि अब हम कुछ नहीं कर सकेंगे। इसी लाचारी में अध्यात्म एक झलक दिखाता है और वह यह है कि हम अपनी इंद्रियों के प्रति जागरूक रहें।

इन इंद्रियों से पैदा होने वाली बीमारियों का इलाज चिकित्सा विज्ञान से कराएं, लेकिन फिर भी इतनी जानकारी तो रखें कि ये बीमारियां आइर्ं कहां से। दस इंद्रियों का एक राजा है मन। विज्ञान की दृष्टि से ढूंढें़ तो शरीर में इसका कहीं पता नहीं लगेगा, लेकिन अध्यात्म की दृष्टि से इसे पाया जा सकता है। इस मन की चाहत कभी खत्म नहीं होती। कबीर ने टिप्पणी की है- मन राजा नायक भया, टांडा लादा जाय।

है है है है हृै रही, पूंजी गयी बिलाय।। इंद्रियों का राजा मन व्यापारी बन गया और वह अपने विषय-भोग की सामग्री-सम्पत्ति गाड़ी में लादकर चल दिया। लोग उसे देखकर कह रहे हैं कि वाह! लाभ है, बहुत लाभ है और इससे मन बहुत खुश हो रहा है।

परंतु वह मूढ़ है, इन विषय-भोग-ऐश्वर्यो के चक्कर में पड़कर, उसने मानव जीवन के सत्कर्मो की पूंजी तथा साधन-भजन खो दिया। मन नियंत्रित हो सकता है साधन-भजन से। असल में उसे कुछ न कुछ तो चाहिए। उसकी मांग पूरी भी हमें ही करनी है। यदि उसे शून्य भी कर दें, तो भी वह खुश हो जाएगा। सक्रियता और निष्क्रियता उसकी मांग है। आप जो भी उसे देंगे, वैसा ही परिणाम आपको मिलेगा।