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मिलीजुली राजनीति में फंसा मोदी का अर्थशास्त्र

भागवत जैसे आदर्श स्वयंसेवक व वाजपेयी जैसे आधुनिक होेने की चाहत में इंदिरा जैसे आंकड़ेबाज बन जाएंगे मोदी।

शेखर गुप्ता | Last Modified - Nov 07, 2017, 05:19 AM IST

मिलीजुली राजनीति में फंसा मोदी का अर्थशास्त्र
जोसेफ हेलर के प्रसिद्ध उपन्यास कैच-22 में लेफ्टिनेंट मायलो माइंडरबाइंडर का चरित्र खुद से कारोबार करके ख्याति अर्जित करता है। वह खुद से इस तरह कारोबार करता कि लेन-देने के चक्र में शामिल हर व्यक्ति को मुनाफा होता, जो अंतत: सरकार की जेब से ही आता है। वह किसी चीज की पूरी सप्लाई खरीद लेता जैसे एक गांव के सारे अंडे, टमाटर खरीद लिए और फिर अपनी ही फौजी यूनिट को मनमाने दाम पर बेच दिए। अपवाद सिर्फ एक था, जब उसने दुनिया का सारा मिस्री कपास खरीद लिया। कोई खरीददार ही नहीं बचा किसी ने उससे खरीदा भी तो वापस उसे ही बेच दिया। मोनोपॉली व्यापारी बनकर उसने मिस्र का कपास बाजार खत्म कर दिया, जिसमें वह स्वयं भी था। पर उसने रास्ता निकाल ही लिया कि क्यों न इसे सरकार को बेच दिया जाए।
अब मायलो माइंडरबाइंडर की जगह 1969 के बाद की भारत सरकार और मिस्री कपास की जगह भारतीय बैंक लाइए। इंदिरा गांधी पहले तो भारत के सारे प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण करती हैं और बैंकिंग तथा फाइनेंस में खासतौर पर राज्य का एकाधिकार स्थापित करती है, क्योंकि इसके पास सारी बीमा कंपनियों व विकासात्मक वित्तीय संस्थानों (पूर्ववर्ती आईसीआईसीआई, आईडीबीआई, आईएफसीआई आदि) का भी स्वामित्व है। फिर यह खुद से खरीदना शुरू करती है : बैंकों को अपने ही बॉन्ड्स में निवेश करवाती है, अपने ही प्रोजेक्ट व सार्वजनिक उपक्रमों को ऋण दिलवाती है, लोन मेला लगाती है, आखिर में लोन माफ कर देती है। इसकी बैंकिंग मोनोपॉली ही इसका वोट खरीदने का बिज़नेस बन जाता है। इस प्रक्रिया में बैंक दिवालिया होते रहते हैं।
चूंकि सारे बैंक सरकारी हैं तो उन्हें नाकाम नहीं होने दिया जा सकता और सरकार के पास टैक्स लगाने और नोट छापने के अधिकार हैं। इसलिए सरकार फिर अपनी ही बैंकें खरीदती है (रीकैपिटलाइजेशन)। बैंकों से आप बॉन्ड जारी करवा सकते हैं। जिसकी मदद से आप अन्य कम्पनियों, अतिरिक्त नकदी वाले सार्वजनिक उपक्रमों को खरीद सकते हैं। अब मुझे बताइए कि क्या हमारी सरकार मायलो माइंडरबाइंडर से भी ज्यादा चतुर पूंजीवादी नहीं है? यदि उसका इकोनॉमिक्स कैच-22 था तो भारत सरकार का कैच-23 होगा।
आपको यह पूछने की इच्छा हो सकती है कि कैच-23 का मेरा यह व्यंग्य बैंकों को उबारने के लिए नवीनतम कार्यक्रम की मेरी सराहना से कैसे मिलता है। यह अच्छा कार्यक्रम है, क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में यही संभव था। यदि आप डॉक्टर हैं और अस्थमा के भीषण अटैक में आपके रोगी का दम घुट रहा हो तो शरीर में साइड इफेक्ट की परवाह किए बगैर स्टेरॉइड्स पम्प करने के अलावा आप क्या करेंगे। 70 फीसदी बैकिंग सरकारी हों, वे दिवालिया होने के करीब हों तो आप क्या करेंगे? फंड खड़ा करने के लिए बॉन्ड जारी करने का आइडिया चतुराई भरा है। लेकिन अब नकदी से मालामाल अन्य सार्वजनिक उपक्रम, जिनमें ज्यादातर ऊर्जा क्षेत्र की मोनोपॉली हैं, को ये बॉन्ड खरीदने को कहा जाएगा। यह विचलित करने वाली बात है।

हम इतने भी नासमझ नहीं है कि उनसे इंदिरा गांधी की सबसे खराब विरासत, बैंकों के राष्ट्रीयकरण को उलटने की मांग करें। लेकिन वे सिर्फ दो सबसे ज्यादा संकट में फंसे बैंक बेचने से शुरुआत करके घोषणा कर सकते थे कि अगले दस साल तक हर साल सबसे खराब बैलेंस शीट वाला बैंक बेच दिया जाएगा। इससे बाजारों में बिजली दौड़ जाती, दूसरे बैंकों को झटका लगता, वे बेहतर काम करते, राजनीतिक वर्ग पर वोट खरीदने के लिए करदाता का चेक देने पर पाबंदी लगती और मोदी का नाम महान सुधारकों में शामिल होता।
पर क्या मोदी वाकई चाहते हैं कि उन्हें आर्थिक सुधारक के रूप में याद रखा जाए। सार्वजनिक उपक्रमों से वादा करना या बिज़नेस में सरकार का होना सुधारक होने की एकमात्र कसौटी नहीं है लेकिन, यह अहम है। कोई भारतीय नेता यहां तक कि मनमोहन सिंह, पीवी नरसिंह राव और पी. चिदंबरम सार्वजनिक उपक्रम बेचने की हिम्मत नहीं जुटा सका। केवल अटल बिहारी वाजपेयी का यह वादा था। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने रोक दिया। संसद की मंजूरी के बिना विनिवेश पर इसने रोक लगा दी और तेल की दो दिग्गज कंपनियों एचपीसीएल और बीपीसीएल की बिक्री रुक गई। मोदी से उम्मीद थी कि वे अपनी ही पार्टी के प्रेरणा-पुरुष का अनुसरण करते। इसकी बजाय वे क्या कर रहे हैं? वे अपनी ही ओएनजीसी को एचपीसीएल बेच रहे हैं। एक बार फिर मायलो ही मायलो से व्यापार कर रहा है। वह भी सरकारी धन से। कैच-23। मोदी समर्थकों का कहना ठीक है कि आज चुपके से सुधार नहीं किए जा सकते थे। लेकिन, जनमत बदलने में मोदी से ज्यादा माहिर कौन है? सवाल है कि वे ऐसा कर क्यों नहीं रहे हैं? वे इसे करना भी चाहते हैं या नहीं। और यदि नहीं, तो वे चाहते क्या हैं? उत्तर है उनकी राजनीति। वाजपेयी के विपरीत वे प्रतिबद्ध स्वयंसेवक हैं और उनकी तरह पुराने आरएसएस वाले सामाजिक अर्थशास्त्र की नादानी को ठहाका लगाकर खारिज करने की बजाय उन्हें इस पर सच्चा भरोसा है। मोहन भागवत की तरह सच्चा स्वयंसेवक बनने और वाजपेयी की तरह आधुनिक सुधारक के रूप में याद रखे जाने की चाहत के बीच फंसकर वे एक और इंदिरा गांधी बन कर रह जाते हैं, एक महान सांख्यिकीविद। एक महान आर्थिक राष्ट्रवादी, विस्तार पाती और उत्तरोत्तर नियंत्रण बढ़ाती सरकार को चला रहा है। मैं उनकी राजनीतिक-आर्थिक धारणा कुछ ऐसी पाता हूं : सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था चलाने में कुछ गलत नहीं है, जब तक कि आप सरकार बुद्धिमानी और ईमानदारी से चलाते हैं। आदर्श राज्य की तलाश कभी सफल नहीं हुई। संभावना अब भी नहीं है।
मोदी ने अपनी युवावस्था और प्रौढ़ आयु पूर्णकालिक स्वयंसेवक के रूप में गुजारी है और उसका असर आसानी से नहीं जाएगा। लेकिन, अब दुनिया से वास्ता, विश्वनेताअों से मुलाकात, सफल अर्थव्यवस्थाओं व समाजों को चलता देखना, उन पर असर डालेंगे और वे भी नव-उदारवादी आदर्श गले लगाएंगे। सामाजिक धार्मिक रूढ़िवाद और नव-उदारवाद साथ नहीं रह सकते। यही वह राजनीति है जहां मोदी का अर्थशास्त्र फंस गया है। इसे हम क्या नाम दें? मैं बताता हूं : कैच-24 पॉलिटिक्स। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
शेखर गुप्ता
एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
Twitter@ShekharGupta
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