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लोकलुभावन नीतियों के खतरे

7 वर्ष पहले
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आम आदमी पार्टी की सरकार ने रेल भवन पर धरना देने का अनोखा काम किया था। अब पार्टी दिल्ली के रामलीला मैदान पर विधानसभा सत्र आयोजित करने की बात कर रही है ताकि जन लोकपाल विधेयक पारित किया जा सके। मजे की बात है कि इसी मैदान पर 'आप' सरकार ने दिल्ली के लोगों की सेवा करने की संवैधानिक शपथ ली थी। किंतु अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने अराजकतावादी लोकतंत्र को ही असली लोकतंत्र बता रहे हैं।


आर्थिक मोर्चे पर भी पार्टी ने अपना होमवर्क नहीं किया है और जनता की मांग पर निर्णय लिए जा रहे हैं। भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने की बात तो 'आप' कर रही है, लेकिन भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए सुधारों की कोई बात नहीं हो रही है। सस्ते पानी-बिजली की भी हकीकत सामने आ चुकी है। सस्ता पानी सिर्फ आधी आबादी को मिलेगा, क्योंकि दिल्ली में नल के पानी तक सबकी पहुंच नहीं है। बिजली की सब्सिडी का लाभ संपन्न तबके को ही मिलने की संभावना है।

बिजली वितरण कंपनियों के ऑडिट से इन कंपनियों के साथ हुए समझौते की वैधता का सवाल उठेगा। कंपनियों की खस्ता वित्तीय स्थिति पर गौर नहीं किया गया, जो पैसा सामाजिक व आधारभूत ढांचे के निर्माण में उपयोग करने की जरूरत थी, वह पैसा अब सब्सिडी में गायब हो जाएगा। उपभोक्ता को वांछित सेवा का उचित शुल्क देना चाहिए, वोट बटोरने के लिए इस सिद्धांत की तिलांजलि दे दी गई। बिजली संबंधी लोकप्रिय घोषणा को आपसी होड़ के कारण अन्य राज्यों के नेता भी अपना रहे हैं। इस तरह जिस बिजली क्षेत्र ने हाल में उबरने के संकेत दिए थे, अब फिर उसके चुनावी बाध्यताओं का शिकार होने की आशंका पैदा हो गई है।


पार्टी इस बारे में उदासीन नजर आती है कि उसकी घोषणाओं का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और घरेलू व विदेशी निवेशकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ऐसा लगता है कि सार्वजनिक उपक्रमों को महत्वपूर्ण भूमिका देने के पुराने दिन लौट आए हैं और उत्पादकता तथा जवाबदेही की उतनी चिंता नहीं है। खुदरा व्यापारियों को खुश करने के लिए 'आप' ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को ठुकराया पर इस कोशिश में निवेशकों का विश्वास खो दिया और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को राजनीतिक फुटबॉल बना दिया, जिसे नेता की मर्जी के मुताबिक इधर-उधर उछाला जा सकता है।


सबसे बड़ी बात तो यह है कि 'आप' खुद के आंदोलनकारी रूप को शासक के रूप में बदल नहीं पा रही है। मंत्री खुद पुलिस थानों में जा रहे हैं, मामले दायर करने के आदेश दे रहे हैं और अफसरों से दुव्र्यवहार कर रहे हैं। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को कोई अधिकार न होते हुए भी विभिन्न संस्थाओं का मुआयना करने को कहा है, जिससे शासन में घुसपैठ की अस्वस्थ परंपरा शुरू होने का खतरा है। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे जनमत संग्रहों पर छोड़ दिए गए हैं। ऐसी गंभीर खामियों वाली आर्थिक व सामाजिक नीतियों के चलते भ्रष्टाचार मुक्त भारत का वादा गुम हो जाएगा।

लेखक ट्राई के चेयरमैन रहे हैं।

director@publicinterestfoundation.com