एक समय की बात है कोई बुजुर्ग अपने समय का ख्यातनाम योद्धा था। वह किसी भी मुकाबले में पराजित नहीं हुआ था। उसने लड़कों को युद्ध कला की शिक्षा देना शुरू किया। वह उन्हें युद्ध कला में पूर्ण पारंगत करना चाहता था। उन्हीं दिनों एक युवा योद्धा काफी लोकप्रिय था। बेहतर से बेहतर लड़ाके भी उसके समक्ष टिक नहीं पाते थे। अपने प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी भांपकर उसे परास्त करने में वह सिद्धहस्त था।
कुछ ही समय में उसने उस बुजुर्ग योद्धा को छोड़कर सभी को पराजित करने का गौरव हासिल कर लिया। अब उसके मन में अहंकार आ गया। उसने सोचा कि क्यों न इस बुजुर्ग योद्धा को भी परास्त कर अपराजेय कहलाऊं। उसने उसे चुनौती दी। शिष्यों के मना करने के बावजूद बुजुर्ग योद्धा ने युवा योद्धा की चुनौती स्वीकार कर ली। युवा योद्धा नियत दिन और समय पर मैदान में आ डटा। अपनी भावी विजय की कल्पना कर वह बहुत प्रसन्न था।
जब बुजुर्ग उसके सामने आकर खड़ा हुआ तो उसकी शांत व दृढ़ दृष्टि देखकर युवा योद्धा का साहस डगमगा गया। मुकाबला शुरू हुआ। युवा योद्धा के हर वार का बेहतर जवाब बुजुर्ग योद्धा के पास था। जब युवा योद्धा हारने लगा तो उसने बुजुर्ग योद्धा को अपशब्द कहना शुरू किया, जिससे वह विचलित हो जाए, किंतु वह शांति से सबकुछ सुनता रहा। अंतत: युवा योद्धा ने पराजय स्वीकार कर ली।
उसके जाने के बाद शिष्यों ने गुरु से उनकी विजय का राज जानना चाहा तो वे बोले- किसी भी मुकाबले में तन की शक्ति से बड़ी मन की शक्ति होती है। यदि मन हर प्रकार से मजबूत हो तो आपकी विजय निश्चित है। वस्तुत: धर्य बहुत बड़ी ताकत है, जिसके बल पर बड़ी से बड़ी जंग जीती जा सकती है।