पाकिस्तान के चुनाव में जिस बड़ी संख्या में वोटर मतदान केन्द्रों तक पहुंचे, वह सचमुच उल्लेखनीय है। इसे दहशतगर्दी के खिलाफ अवाम के खामोश बयान के रूप में देखा जा सकता है।
2008 के चुनाव में सिर्फ 44 प्रतिशत वोट पड़े थे। पाकिस्तान के चुनाव आयोग के अनुमान के मुताबिक इस बार यह संख्या 60 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसके बावजूद कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने उम्मीदवारों और आम लोगों को खौफजदा करने के लिए प्रचार के दौरान बड़े पैमाने पर खून-खराबा किया। उस हाल में भी चुनाव में भारी जन-भागीदारी देश में लोकतंत्र का जनाधार मजबूत होने का संकेत है।
नतीजतन पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार संभव हुआ है, जब एक से दूसरी असैनिक सरकार के हाथ में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होगा। चुनाव में नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना बताता है कि मतदाताओं ने उपलब्ध विकल्पों के बीच उस पार्टी को चुना जिसका लंबा राजनीतिक दांव है और जिसके पास शासन करने का अनुभव है। नवाज शरीफ ने पिछले पांच साल सब्र एवं परिपक्वता का परिचय दिया। 1990 के दशक के कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को असंवैधानिक तरीके से सत्ता से बेदखल करने की साजिशों का हिस्सा बनने से वे इनकार करते रहे। दूसरी तरफ यह चर्चा थी कि फौज एवं लोकतंत्र विरोधी अन्य शक्तियों का हाथ इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ की पीठ पर है। गहराते जनअसंतोष और ताकतवर समूहों के समर्थन के आधार पर पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट कप्तान ने सियासत में सुनामी लाने की खूब चर्चा की। लेकिन मतदाताओं ने इस पर भरोसा नहीं किया।
पीपीपी की अलोकप्रियता और तालिबान द्वारा उसके तथा दूसरे उदारवादी दलों को निशाना बनाने से बने माहौल का कुछ लाभ इमरान खान को जरूर मिला और उनकी पार्टी एक प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरने में सफल रही। दरअसल, लोकतंत्र के लिए इस आशाजनक घटनाक्रम पर धब्बा चरमपंथी समूहों द्वारा फैलाया गया आतंक ही है, जिसके कारण पीपीपी, अवामी नेशनल पार्टी और मुहाजिर कौमी मूवमेंट जैसे दल प्रचार अभियान चला ही नहीं पाए। बहरहाल, आम मतदाताओं ने चरमपंथ और अधिनायकवाद को नकारकर पाकिस्तान के बेहतर भविष्य की नींव डाल दी है।