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मेडिकल की किताब लिखने की खुशी

सातवीं-आठवीं कक्षामें हमारे नानाजी ने गांधीजी की कुछ किताबें पढ़ने को दी।

Dainik Bhaskar

Nov 06, 2017, 06:20 AM IST
pleasure of writing a medical book
सातवीं-आठवीं कक्षामें हमारे नानाजी ने गांधीजी की कुछ किताबें पढ़ने को दी। उन पुस्तकों को पढ़कर समाजसेवा का कुछ विचार बीज रूप में पड़ा। वह कोई उम्र नहीं होती इतनी बड़ी बातें सोचने की पर अनजाने में जरूर कुछ प्रभाव होते हैं, जिनका असर बाद में सामने आता है। जब मैं 11वीं-12वीं में पहुंचा तो फिर डॉक्टर बनने का विचार पक्का हुआ।

रोगियों का इलाज एक बात थी पर उन दिनों मेडिकल अध्ययन के लिए सामग्री तक भारतीय विद्यार्थियों की पहुंच जरा कठिन ही थी। एक हजार डॉलर की किताब है तो यह भारत में इतनी महंगी होती कि भारतीय पाठक खरीद नहीं सकते थे। किताबें इसलिए महंगी होती है, क्योंकि लेखकों और प्रकाशकों को रॉयल्टी देनी पड़ती है। इस विचार ने डॉक्टर से शोधकर्ता और लेखक भी बना दिया। मैंने अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करके विश्व के नामी-गिरानी लेखकों से अनुरोध किया। हमने सबने अपनी रॉयल्टी छोड़ दी और समाजसेवा के नाम पर हमने टेक्स्ट बुक ऑफ हेड एंड नेक सर्जरी किताब तैयार की, जो देश की सर्वश्रेष्ठ टेक्स्टबुक बनी और फिर उसे सिर्फ 100 डॉलर में बेचा। उसमें कीमती ग्लॉसी कागज थे, बहुत सारे रंगीन चित्र थे, क्योंकि मेडिकल में यदि कलर पिक्चर्स हो तो छात्रों को समझ में नहीं आता। वह देश में अनूठा प्रोजेक्ट था। जहां तक इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हेड एंड नेक सर्जरी की बात है, तो उसकी कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जो भारतीय शोधकर्ता अपना डेटा या अपना काम प्रकाशित करना चाहते हैं, तो कई समस्याएं आती हैं। हमारी अंग्रेजी की, भाषा की समस्याएं होती हैं। इसलिए इंटरनेशलन जर्नल कई बार भारतीय लेखक के लेख खारिज कर देती हैं। उनकी स्वीकार्यता बहुत कम होती है। मुझे लगता था कि यदि हमें भारत के लोगों को बढ़ावा देना है तो उन्हें एक अच्छा प्लेटफॉर्म देना होगा ताकि इन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके शोध-पत्र प्रकाशित हों। फिर ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हेड-नेक’ सर्जरी हमने शुरू की। दो-तीन महीने में जो अंक आता है उसमें 12 से 16 शोधपत्र भारत के शोधकर्ताओं के होते हैं, जिन्हें हम प्रमोट करते हैं। चूंकि हमने ही यह पेशकश की थी तो हम ही इसके संपादक बने।

कैंसर के इलाज ऐसा पेशा है कि रोज मृत्यु से साक्षात्कार होता है, क्योंकि 80 फीसदी मरीज तो एडवान्स्ड स्टेज में आते हैं। यानी चार-छह महीने में वे नहीं रहते। फिर इन्हें होने वाली तकलीफ भी बड़ी विचलित करने वाली होती है। जब किसी मरीज का आपने प्यार से इलाज किया हो, उससे आत्मीयता हो गई हो, पर रोग लाइलाज होकर फिर लौट आए तो बड़ी तकलीफ होती है। लेकिन, खुशी तब होती है जब कम उम्र का कोई रोगी आपके ऑपरेशन से बच गया हो। ऐसे कई मौके आते हैं। अभी मुझे वॉट्सएप मैसेज मिला था। एक 17 साल की लड़की थी। उसे थायरॉइड कैंसर हुआ था। मैंने उसका ऑपरेशन किया था। वह ठीक हो गई। उसकी शादी हुई। उसके बच्चे हैं। उसने लिखा कि मैं घर में ईश्वर का फोटो तो रखती ही हूं, आपका भी रखती हूं। मैंने ईश्वर को नहीं देखा, पर मुझे तो जीवनदान आपसे ही मिला। अब यह उसकी भावनाएं हैं, हम डॉक्टर तो अपने हर ऑपरेशन में अपना सबकुछ लगा देते हैं। पर ऐसी घटनाएं गहरे संतोष से भर देती हैं।
दिल्ली के एक एक्साइज कमिश्नर थे। उन्हें गले में बहुत एडवान्स्ड कैंसर था। उन्हें कह दिया गया था कि वे चंद महीनों के मेहमान हैं। वे हमारे यहां आए, बड़े परेशान। हमने उन्हेें कहा कि ऑपरेशन करना चाहिए चाहे इसमें बहुत जोखिम है, क्योंकि शरीर की मुख्य नस जो ब्रेन के लिए खून ले जाती है, उसी में ट्यूमर धंसा हुआ था। ब्रेन की ब्लड सप्लाई बंद होकर जान भी जा सकती है। हमने कहा कि मृत्यु तो वैसे भी चार माह बाद होनी ही है, क्योंकि प्रयास करके देखा जाए। आप तो एनेस्थेसिया के प्रभाव में रहेंगे, कष्ट तो हमें होगा। बहुत डर-डर के ऑपरेशन करना होगा। बहुत टेंशन रहा। हमने सर्जरी की, जो सफल रही। आज दस-बारह साल हो गए। वे ठीक हैं। कहने का मतलब है कि कई बार जब रोगी बहुत हताश होकर आता है, उस समय आप उसमें कोई उम्मीद जगा दें, तो जो खुशी मिलती है वह आम केसेस में दुर्लभ है।

भारत में शोध तो होता है पर उन्हें रिकग्निशन नहीं मिलता, मान्यता नहीं मिलती। हमारे उतना पैसा सुविधाएं नहीं लगाई जातीं। पहली बार अमेरिकी हेड-नेक सोसायटी ने भारत के शोध-पत्र को वहां शोध के क्षेत्र के सबसे बड़े अवॉर्ड से नवाज़ा था। मुझे खुशी है कि मैं भारत का पहला मेडिकल विज्ञानी बना जिसे रॉबर्ट मैक्सवेल बायर अवॉर्ड से नवाजा गया। देश के लिए, टाटा अस्पताल के लिए खुशी की बात थी कि पहली बार ऐसा अवॉर्ड मिला।

तम्बाकू-गुटके पर प्रतिबंध की बात ऐसी है कि यहां अस्पताल में लोग आते थे उन्हें हम इन चीजों के खतरे बताते थे। फिर दिमाग में आया कि ऐसा कुछ हो कि व्यापक समाज में यह संदेश पहुंचे। मैं स्थानीय स्तर से लेकर प्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर हर जिम्मेदार व्यक्ति से मिला, टाटा अस्पताल का स्टॉफ भी बहुत सहायक बना। इसमें दिक्कत भी आई। तंबाकू लॉबी प्रेशर तो डालती ही है।
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