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इनोवेशन कब आएगा चुनावी एजेंडे पर?

7 वर्ष पहले
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गरमागरम चुनावी चर्चा में देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इनोवेशन के मुद्दे की ओर राजनीतिक दलों का तो ध्यान है ही नहीं, बुद्धिजीवी भी इसकी ओर से पूरी तरह उदासीन हैं। हम अब तक यह समझ नहीं पाए हैं कि इनोवेशन की संस्कृति निर्मित करनी पड़ती है और उसके अनुरूप नीतियां बनानी पड़ती हैं।


हमारे यहां राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक अधिकारों पर बहस होती है, आंदोलन किए जाते हैं। हालांकि, हम यह नहीं समझते कि इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए आर्थिक क्षमता होनी जरूरी है। कांग्रेस, वामपंथी और अब 'आप' जनसेवा की बातें करते हैं, लेकिन सेवा मुफ्त नहीं मिल सकती। वैल्थ क्रिएशन होने पर ही कल्याणकारी राज्य चलाया जा सकता है।


वैल्थ क्रिएशन में इनोवेशन महत्वपूर्ण है। टेक्नोलॉजी में ज्यादा से ज्यादा शोध होने पर देश अपने आप धनी होता जाता है। यूरोप-अमेरिका जनोपयोगी टेक्नोलॉजी के तेजी से विकास के कारण धनी हुए। वहां पहले टेक्नोलॉजी में इनोवेशन आया, लोगों को अधिकार तो बाद में मिले। यह क्रम महत्वपूर्ण है। उचित टेक्नोलॉजी से बाजार का निर्माण और बाजार से पैसा, यह है समीकरण। एक एपल के कारण ही अमेरिकी तिजोरी में अरबों डॉलर आते हैं। अमेरिका में ऐसी कई कंपनियां हैं और वे लगातार इनोवेशन पर जोर देती रहती हैं। जर्मनी की भी यही कहानी है। सबसे पहले किसी नई चीज की खोज या आविष्कार करना। फिर उसके जरिये कोई उत्पाद बनाना। ये संपत्ति निर्माण के चरण हैं। हालांकि, केवल इसकी जानकारी होने से काम नहीं चलता। जैसा कि परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोडकर कहते हैं जनमानस में यह आत्मसात होने के बाद इनोवेशन की संस्कृति निर्मित होनी जरूरी है।


भारतीय समाज में इनोवेशन की कमी नहीं है। कई लोग कई प्रकार की कल्पनाशील चीजों का निर्माण करते रहते हैं, लेकिन उनकी कल्पनाशीलता किसी गांव या किसी एक जुगाड़ तक सीमित रहती है। उसमें से टेक्नोलॉजी और फिर बड़े पैमाने पर उत्पादन के चरण आते ही नहीं। यही भारत की नाकामी है। सरकार उद्योगों पर शोध के लिए खर्च करने की अनिवार्यता लागू करके अपना पल्ला झाड़ लेती है। सरकार को ऐसा माहौल निर्मित करना होगा, जिसमें इनोवेशन को बढ़ावा मिले और फिर उससे टेक्नोलॉजी का विकास हो।


नरेंद्र मोदी ने नए जमाने के अनुरूप स्मार्ट एजेंडा लोगों के सामने रखा है, लेकिन इनोवेशन को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां होंगी तो ही यह एजेंडा सफल होगा। चीन को यह अहसास हो गया है कि ऐसी नीतियां न हों तो अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर ही रहती है। इसीलिए उसने अधिक से अधिक पेटेंट हासिल करने पर ध्यान केंद्रित किया है। वह समझ गया है कि केवल बड़े पैमाने पर उत्पादन से अमेरिका व यूरोप को टक्कर नहीं दी जा सकेगी, किंतु हमारे नेता अब भी मुफ्त बिजली, सस्ते अनाज, टोल फ्री रास्ते जैसे दो कौड़ी के एजेंडे पर वोट मांग रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि मतदाताओं को भी ऐसा एजेंडा पसंद आ रहा है।

लेखक दिव्य मराठी, महाराष्ट्र के संपादक हैं

prashant.dixit@dainikbhaskargroup.com