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अब टेक्नोलॉजी की तानाशाही का नया दौर

बिज़नेस करने की आसानी अच्छा विचार है और सारे देशों को साधारण प्रक्रिया के तहत इतना तो करना ही चाहिए।

प्रीतीश नंदी | Last Modified - Nov 11, 2017, 06:52 AM IST

अब टेक्नोलॉजी की तानाशाही का नया दौर
महान राष्ट्रअपनी जीडीपी दर की रफ्तार या शेयर सूचकांकों की उछाल से नहीं जाने जाते। सही है कि बिज़नेस करने की आसानी अच्छा विचार है और सारे देशों को साधारण प्रक्रिया के तहत इतना तो करना ही चाहिए। लेकिन, महान राष्ट्र वास्तव में सरल-से गुणों से जाने जाते हैं जैसे अपने लोगों में कल्पनाशीलता और प्रतिभा। यही गुण उन्हें सबसे अच्छे और सबसे बुरे दौर से निकाल ले जाते हैं। कुछ लोगों को प्रसन्नता सूचकांक के शीर्ष पर आकर खुशी होती है। कुछ अन्य चुपचाप स्वतंत्रता की शक्ति को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता अकेली ही लोगों को उनकी वास्तविक रचनात्मक क्षमता साकार करने और वह बनने देने में मदद करती है, जो वे हैं या बनना चाहते हैं।

भारत हमेशा से अपने साहित्य, अपनी रचनात्कमता ललित कलाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। इसका काफी कुछ संस्कृति में इसकी गहरी जड़ों, आस्था और परम्परागत मूल्यों से आया है। हाल के वर्षों में इसमें से कुछ बदल गए हों पर भारत अब भी ऐसा देश हैं जहां से सर्वोत्तम लेखन, संगीत, कला, नाट्य, नृत्य अब भी आता है। दुनिया के दस सर्वोत्तम लेखकों के नाम लीजिए और आप पाएंगे कि उसमें तीन भारतीय अथवा भारतीय मूल के हैं। ज्यादातर संभावना यही है कि वे सब अंग्रेजी में ही लिख रहे होंगे (क्षेत्रीय भाषाओं में जो अद्‌भुत काम हो रहा है उसे अभी पूरी तरह से पहचाना जाना है और अच्छे अनुवाद अब भी के बराबर हैं)। इससे भी रोचक बात तो यह है कि हम अप्लाइड आर्ट में ताज़ा, नए विचार ला रहे हैं। इसलिए आप रोचक भारतीय फिल्में, नई जमीन तोड़ने वाले डिज़ाइन आर्किटेक्चर और रंगमंच, संगीत और नृत्य में बहुत सारा इनोवेशन पाएंगे। दुनिया के महान फैशन शो अब भारतीय फैशन प्रदर्शित कर रहे हैं। अब भोजन नया रोमांस है। दुनिया ने अचानक खोज की है, जो हम पहले से ही जानते रहे हैं कि थोड़े ही देश होंगे जहां व्यंजनों की इतनी समृद्ध और विविधतापूर्ण विरासत है। दुख तो यह है कि हमारी संस्कृति को वैसा पालन-पोषण नहीं मिलता, जिसकी वह हकदार है। लेकिन, यह तो उस देश में अपेक्षित ही है, जहां 80 फीसदी समय राजनीतिक खबरें ले लेती हैं। इसलिए कुछ हद तक यह अपरिहार्य है कि हम जो सांस्कृतिक चयन करते हैं वे प्राय: हमारे राजनीतिक चुनाव से संचालित होता है। और हां, प्राय: विनाशकारी नतीजों के साथ।
लेकिन, उपेक्षा से भी खराब तो उन लोगों के साथ हमारा व्यवहार है, जो हमें दुनिया के सांस्कृतिक मानचित्र पर लाते हैं। हमारे महानतम चित्रकारों में से एक हुसैन मुट्‌ठीभर बदमाशों के कारण विदेश में निर्वासित होने पर मजबूर हुए। हमारे शानदार लेखकों में से एक पेरुमल मुरुगन ने इसलिए लिखना बंद कर दिया ताकि वे शांति से और निडर होकर जी सकें (सौभाग्य से लंबे ब्रेक के बाद हाल ही में वे कविताओं की साहसी किताब के साथ सामने आए हैं)। हमारे सर्वोत्तम अभिनेताओं में से एक कमल हसन को पिछले हफ्ते अपने विचार जाहिर करने पर खुले आम हत्या की धमकी दी गई और इससे भी बुरी बात यह कि ज्यादा लोग उनके बचाव में सामने नहीं आए। अब ज्यादा लोग किसी के भी बचाव में आगे नहीं आते। विचार-विमर्श की भाषा विषैली हो गई है। नफरत ही हमारे दौर की बोली है।

जैस-जैसेे हमारे, अापके हाथों से अधिकाधिक शक्ति खिसकती जा रही है और कानून बनाने और तोड़ने वालों का खतरनाक गठजोड़ शासन कर रहा है तो हमारे विकल्प घटते जा रहे हैं। चिरपरिचित आज़ादियों का अब वज़ूद नहीं है। भिन्न होने या कई बार थोड़ा अलग चलने की आज़ादी भी चली गई है। इसी तरह नाकाम होने की आज़ादी भी उस दुनिया में छिन गई है, जहां सफल होना ही एकमात्र गुण है, जिसे लोग मान्यता देते हैं। हम तो पूरी व्यवस्था से ही बाहर आकर ज़िंदगी के लए कोई नए मानक तय करने की आज़ादी भी खो चुके हैं। हम सब कगार की ओर दौड़ने की पागल रेस में शामिल हो गए हैं।
टेक्नोलॉजी नया अभिशाप है। इसलिए नहीं कि टेक्नोलॉजी में कुछ गलत है बल्कि इसलिए क्योंकि यह राज्य-व्यवस्था का नया हथियार बन गई है। दशकों पहले स्टीफन हॉकिंग ने जैसा आगाह किया था उसी प्रकार बदलाव के बहाने यह दमन का औजार बनती जा रही है। नई टेक्नोलॉजी से इनकार करने को पुरातनपंथी होने की तरह देखा जाता है। पर नई टेक्नोलॉजी हमारी ज़िंदगी में अधिकाधिक घुसपैठ करती जा रही है, अधिकाधिक खतरनाक होती जा रही है,क्योंकि वह उन्हीं आज़ादियों को घटा रही है, जिनकी रक्षा के लिए उसे डिज़ाइन किया गया है। इसलिए रातोरात हमारी करेंसी गायब हो जाती है। हमें इसमें कुछ कहने का हक नहीं है। हमारे पुराने पहचान-पत्र बेकार हो जाते हैं। हम कुछ नहीं कह सकते। नए पहचान-पत्र लाए जा रहे हैं और सिर्फ हमें उन्हें अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है बल्कि उन्हें हमारी ज़िंदगी के हर महत्वपूर्ण पहलू से जोड़ने को कहा जा रहा है ताकि जब इन्हें हेक कर लिया जाए या चुरा लिया जाए (जैसा प्राय: आज की दुनिया में होता है) तो तत्काल हमारी ज़िंदगी का हर पहलू चौराहे पर जाहिर हो जाए। हमारी प्रायवेसी का कुछ पता नहीं है। किस उद्‌देश्य से? कोई सरकार बताने को तैयार नहीं है वह अपने नागरिकों की निजता सुरक्षा को खतरे में क्यों डाल रही है वह भी बिना फायदे के सिवाय इसके कि व्यापक निगरानी का हक उसे मिल जाएगा। नकदी की जगह लेने वाले डिजिटाइजेश के प्रति जुनून भद्‌दे सत्ता के खेल का नया प्रतीक है। यह हमारे जीवन और आजीविका के केंद्र में टेक्नोलॉजी ला देता है और इन्हें नियंत्रित करने वाले लोगों को सबकुछ पर उससे बहुत अधिक नियंत्रण देता है, जो संविधान के तहत उन्हें हासिल है।

सौभाग्य से ये सारे मामले इस माह सुप्रीम कोर्ट के सामने होंगे। जहां सरकार इस सबको अपरिहार्य बनाने की जल्दी में है, लोग अपने पैर पीछे खींच रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि हमारे संविधान के मूलाधार न्याय, निष्पक्षता और चयन की स्वतंत्रता इस हमले से बच जाएंगे। हम भारतीय बर्बर शक्ति को सम्मान नहीं देते (इसीलिए तो इमरजेंसी नाकाम रही थी)। स्वतंत्रता हमारे लिए सबकुछ है। उम्मीद है कि अदालतें शिकारी टेक्नोलॉजी से उस स्वतंत्रता को संरक्षण देंगी, जो हमारी ज़िंदगी पर अवांछित नियंत्रण लाने की सरकार की बेचैनी को भुनाना चाहती हैं।
(येलेखक के अपने विचार हैं)
प्रीतीश नंदी
वरिष्ठपत्रकार और फिल्म निर्माता
pritishnandy@gmail.com
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