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डाउनलोड करेंजिन चुनावों को देखते हुए मैं बड़ा हुआ हूं वे अलग थे, बहुत ही अलग। वे आबादी से जुड़े तथ्यों पर आधारित होते थे। जाति, उपजाति, धर्म, समुदाय और कुछ अन्य क्षेत्रीय मुद्दे। तब जटिल चुनावी गणित परिदृश्य में नहीं आया था। सरल से जोड़-घटाव से बात बन जाती थी। कुछ चुनाव क्षेत्रों में जरूर मुद्दे एक-दूसरे से टकराते थे। तब पार्टी विश्लेषकों को विकल्पों का मूल्यांकन करना पड़ता था। यहीं पर चीजें गलत होनी शुरू हुईं, लेकिन मोटेतौर पर लोग अपनी समझ के अनुसार ही वोट दिया करते थे। तब से भारत बहुत बदल चुका है। पिछले पांच वर्षों में कुछ ज्यादा ही बदला है। अब वोट देते वक्त लोग कुछ अन्य बातों को भी ध्यान में रखने लगे हैं। ऐसी बातें जो उन्हें लगता है कि खुद के लिए वोट देने से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
नरेंद्र मोदी का भरोसा है कि लोग विकास के लिए वोट देंगे। यही वजह है कि उन्होंने धीरे से भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान के परंपरागत मुद्दों से पल्ला झाड़ लिया है। इसकी बजाय वे ऐसे नए, साहसी भारत के निर्माण पर जोर दे रहे हैं, जो दुनिया का सामना कर सके। आबादी के आंकड़े बताते हैं कि इस साल ऐसे 15 करोड़ युवा होंगे, जो पहली बार वोट देंगे। इतिहास या विचारधारा में उनकी कोई रुचि नहीं है। उन्हें चाहिए बेहतर नौकरियां, अधिक रोमांचक कॅरिअर और अपने बूते आगे बढऩे के मौके। मोदी उन्हें चमचमाती अर्थव्यवस्था की संभावनाएं बेच रहे हैं। पृष्ठभूमि में अब भी हिंदुत्व और सरदार पटेल हो सकते हैं पर वह सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को खुश रखने के लिए है।
निश्चित ही वे ऐसा वादा कर रहे हैं, जिस पर लोगों को भरोसा है कि वे यह करके दिखा सकते हैं। वे उन्हीं औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनसे उन्हें सुनने वाले लोग परिचित हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर सबसे पहले आगाज किया और इसके बाद आक्रामक रोड शो शुरू किए, किंतु अब केवल युवा वर्ग ही उनके समर्थकों में नहीं है। बढ़ता बिजनेस समुदाय तो उनकी पूजा करता है। यह समुदाय खुलकर उनका समर्थन कर रहा है। दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल को यकीन है कि भारतीय, सारे भारतीय भ्रष्टाचार से नफरत करते हैं। उन्हें लगता है कि भ्रष्टाचार के कारण उन्हें अपने हक नहीं मिल रहे हैं। इसीलिए भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकना उनका वादा है। वे सड़कों पर की जाने वाली राजनीति के तात्कालिक आकर्षण और उसे मिलने वाले रियल टाइम कवरेज की ताकत को समझते हैं। मोदी की तरह उन्होंने भी सोशल मीडिया पर पूरी ताकत से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इन औजारों के जरिये उन्होंने महत्वाकांक्षी मध्य वर्ग में पहुंच बनाई है। लगातार बढ़ता और अपनी आवाज सुनाने पर उतारू मध्य वर्ग, जो राजनीतिक तवज्जो पाने के लिए बेचैन है।
इस मध्य वर्ग को इस बार जलाने के लिए रावण चाहिए और भ्रष्टाचार बिलकुल सही लक्ष्य है। कांग्रेस से इस बुराई का रिश्ता होने के कारण एक झटके में कांग्रेस दौड़ से बाहर हो जाती है। यही तो वह बात है जो केजरीवाल चाहते हैं, ताकि वे कांग्रेस के परंपरागत वोट-बैंक का बड़ा हिस्सा झटक लें। मध्य वर्ग चाहे उनके उपद्रवी तौर-तरीकों के प्रति संदेह रखता हो, लेकिन जिस तरह से वे खेल के नियम बदल रहे हैं, उससे वे प्रभावित हैं। इसी कारण 'आपÓ समाज के बहुत अच्छे लोगों को आकर्षित कर रही है। ऐसे लोग जिन्हें जुडऩे के लिए किसी गैर-परंपरागत विकल्प की अरसे से तलाश थी।
इसके बाद कांग्रेस के चुनाव अभियान के लिए स्थिरता के मुद्दे का ही आधार बचता है। यह युवा और आर्थिक रूप से ऊपर बढ़ते तबके मोदी के पक्ष में गंवा चुकी है और मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा केजरीवाल को दे चुकी है। अल्पसंख्यकों और बुद्धिजीवियों से भी यह दूर हो चुकी है। यहां तक कि इसने कॉर्पोरेट जगत को भी खो दिया है जो हमेशा इसके साथ होता था। हालांकि कॉर्पोरेट जगत को कांग्रेस के समाजवादी प्रलापों और लोक-लुभावन नीतियों से नफरत थी। ये नीतियां वास्तव में पार्टी के दिग्गजों को सरकारी तिजोरी से पैसा चुराने के बनती रही हैं।
अर्नब के साथ बातचीत में राहुल गांधी को सुनने से उनकी सोच के बारे में कुछ मजेदार संकेत मिलते हैं। उन्होंने एक बार भी धर्मनिरपेक्षता का नाम नहीं लिया। उन्होंने भ्रष्टाचार के सारे आरोपों को टाल दिया और घूम-फिरकर 'बिग पिक्चरÓ(विशाल परिदृश्य) की बात करते रहे। वे जिस वोट बैंक को संबोधित कर रहे थे, वे निश्चित ही महिलाएं और युवा थे। हालांकि इस वर्ग को भी वे ठीक से संबोधित नहीं कर पाए। इस वर्ग पर उनकी कोई पकड़ दिखाई नहीं दी। तैयारी कहीं नजर नहीं आई। हालत इतनी खराब थी कि असाधारण रूप से सहानुभूतिपूर्ण नजर आ रहे अर्नब ने उन्हें बख्श दिया।
ऊपर हमने जिनकी चर्चा की है, 2014 के आगामी आम चुनाव में ये लोग प्रमुख खिलाड़ी हो सकते हैं, लेकिन मैदान में सिर्फ ये ही लोग व पार्टियां नहीं हैं। दूसरे लोकप्रिय नेता भी हैं, जो फिलहाल चर्चा के केंद्र में नहीं हैं। नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, जयललिता, मायावती, ममता, जगमोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू भी वोट खींचने की ताकत रखते हैं। वे चतुर गठबंधन के जरिये बड़ी आसानी से नतीजे बदल सकते हैं। हमने हाल ही देखा है कि किस तरह 8 सीटों वाली कांग्रेस ने 32 सीटों वाली भाजपा को तगड़ा झटका दिया।
चतुराईपूर्वक किए गए गठबंधन कांग्रेस को अब भी मैदान में बनाए रख सकते हैं, क्योंकि बात सिर्फ सीटें जीतने की नहीं है। सारा मामला विजयी गठबंधन बनाने का है। सर्वाधिक सीटें जीतने वाली पार्टी हो सकता है आखिर में सरकार बनाने में नाकामयाब रहे, क्योंकि उसे मात देने के लिए दूसरे आगे आ सकते हैं। यही वह संभावना है जहां कांग्रेस का विशाल चुनावी शस्त्रागार उसकी मदद कर सकता है। हां, फिलहाल तो स्थिति उसके खिलाफ नजर आती है। उनका चुनाव अभियान दयनीय नजर आता है। पैसा चतुराईपूर्वक बनाई गई रणनीति की जगह नहीं ले सकता। और साफ कहें तो ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस को जीतने की चिंता है ही नहीं। कांग्रेस के रणनीतिकार तो चुनाव बाद के परिदृश्य पर काम कर रहे हैं। जहां वे दूसरों से ज्यादा चतुराई दिखाकर यूपीए-3 का जुगाड़ कर लेंगे। क्या ऐसी कोई संभावना है? क्यों नहीं? परेशानी सिर्फ इस बात की है कि उनके गठबंधन साथियों को भी विजेता के पाले में जाने की आदत है। ऐसे में मोदी मौका हथिया सकते हैं। या हो सकता है कि केजरीवाल कोई अलग ही तरीका खोज निकालकर बाजी मार लें।
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