• कैंपस में उदारता खारिज, एनजीओ पर संदेह

कैंपस में उदारता खारिज, एनजीओ पर संदेह / कैंपस में उदारता खारिज, एनजीओ पर संदेह

मैं ऐसे दौर में जन्मा, जिसने हमें कई विकल्प दिए। यह वह दौर था, जिसने इन सारे विकल्पों को सम्माननीय भी बनाया।

Aug 20, 2016, 04:54 AM IST
कैंपस में उदारता खारिज, एनजीओ पर संदेह
मैं ऐसे दौर में जन्मा, जिसने हमें कई विकल्प दिए। यह वह दौर था, जिसने इन सारे विकल्पों को सम्माननीय भी बनाया। इसलिए हमारे माता-पिता चाहे हमें डॉक्टर या इंजीनियर होते देखना चाहते थे, हम कवि, संगीतकार, कलाकार और विद्रोही बनें। दुस्साहस हमारी पीढ़ी की खास पहचान थी। विकल्प हमेशा हमारा हुआ करता था। विद्रोह के रोमांस का पीछा करना या जमीन से जुड़ा कठिन कॅरिअर अपनाना। फिर भी मेरे ऐसे दोस्त हैं, कई दोस्त हैं, जो जीवन में लड़खड़ाए। उनके सामने यह स्पष्ट नहीं था कि वे क्या करना चाहते हैं और उसमें कुछ भी गलत नहीं था। वे बिल्कुल सही थे। यदि आप नाकाम रहते थे तो कोई आपका आकलन करने, नुक्ता-चीनी करने नहीं बैठ जाता था। इसी तरह यदि आप बाहर जाकर बहुत-सा पैसा कमाए तो भी किसी को उसकी परवाह नहीं होती थी। कोई उसे जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं देता था। दोनों ही विकल्प अच्छे थे।

कुछ वर्षों पहले मैं अपने स्कूल के एक साथी से टकराया। विजय कक्षा में टॉपर होता था। किंतु हमारे बीच के कई छात्रों की तरह वह इससे कोई बहुत खुश नहीं था। सच तो यह था कि इससे वह कुछ लज्जित-सा महसूस करता था। इसलिए मैंने और उसने (कक्षा 9 में) त्रिकोणमिती की तानाशाही से बचकर दुनिया देखने के लिए घर से भागने का निश्चय कर लिया। अंतिम क्षण मंे मैं कमजोर पड़ गया। मुझे चिंता हुई कि इससे मेरे सेवानिवृत्त पिता का दिल कितना टूट जाएगा। किंतु विजय के पिता नहीं थे अौर वह मुझसे अधिक बहादुर था, इसलिए वह योजना के मुताबिक आगे बढ़ गया। पुलिस ने आखिरकार उसे अगरतला में पकड़ लिया और उसे वापस लाया गया। वह कक्षा में लौट आया और उसने अपना अच्छा प्रदर्शन जारी रखा।

कई वर्षों बाद बेंगलुरू की यात्रा के दौरान मैं और मेरा एक दूसरा मित्र दोस्ताना से नज़र आ रहे एक फूड कार्ट के पास रुके। और क्या देखते हैं कि हमारा वही पुराना विजय शेफ की हैट लगाए स्ट्रीट फूड बनाकर बेच रहा है। सबसे प्यारी बात तो यह रही कि वह बड़े गर्व के साथ यह सब कर रहा था। शाम को वह हमें अपनी पत्नी और बच्चों से मिलाने घर ले गया। उन सबको भी विजय पर बड़ा गर्व था। उसके बाद वह अमेरिका चला गया और वहां वह ट्रक चला रहा है। इससे उसका रोज नई जगह देखने का जीवनभर का जुनून पूरा हो रहा है।

कुछ और प्रसिद्ध उदाहरण हैं। सत्यजीत रे ने फिल्म बनाने के िलए विज्ञापन की दुनिया में अपने सफल कॅरिअर को ठुकरा दिया था। उनके पास पैसे नहीं थे और कोई उन्हें उधार देने को भी तैयार नहीं था। इसलिए वे सीधे मुख्यमंत्री के पास पहुंच गए। सरकार ने कुछ नियमों को तोड़ा-मरोड़ा और चूंकि फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ (राह का गीत) थी, उसने उन्हें अपने सड़क एवं शहरी विकास के फंड से 5 लाख रुपए दिए। उस चतुराई से किए फंड डायर्शन (इसे तो आज भ्रष्टाचार कहा जाता) का नतीजा वह हुआ, जिसे प्राय: दुनिया की सर्वकालिक महानतम फिल्म कहा जाता है। ध्यान दें, महानतम फिल्म! सबसे सफल नहीं। कोई याद नहीं करता कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कैसी रही थी। किसी को उसकी परवाह है भी नहीं। किंतु रे ने अविश्वसनीय मास्टरपीस फिल्म निर्मित की, जो आज भी इस तथ्य का पुष्टि करती है कि यदि बैंक लोन चुकाने की चिंता न हो तो हम क्या करके दिखा सकते हैं।

दिल्ली की एक बरसाती में कंगाल होकर दुनिया से विदा लेने वाले मेरे दोस्त गायतोंडे को तो दोस्त लोग गाहेबगाहे भोजन भेजा करते थे। आज उस पर ग्रंथ लिखे जा रहे हैं, क्योंकि अचानक उसके कैनवास वैश्विक नीलामी में रेकॉर्ड कीमत हासिल कर रहे हैं। यदि उसे मालूम होता कि वह इतना प्रसिद्ध हो जाएगा तो शायद उसने इतनी चिंता नहीं की होती और बरसों मौन रहकर काम करता रहता। फिर एक और दोस्त सोज़ा है, ईश्वर प्रदत्त प्रतिभावान, लेकिन उसकी सबसे बड़ी शिकायत यही है कि उसके काम की बजाय हुसैन को हमेशा बेहतर रकम मिली। उसकी कलाकृतियां हमेशा इतिहास का अंग बनी रहेंगी और किसी को इस बात की परवाह नहीं है कि मूल रूप से ये कितने में बिकी थीं। वास्तव में पैसा तो उन्हें मिलेगा, जो कला के व्यवसाय में लगे हैं।

हर सफल रविशंकर के लिए हमेशा अधिक नहीं तो उतने ही प्रतिभाशाली निखिल बनर्जी होते हैं। हर आडंबर प्रिय हुसैन के लिए हमेशा कोई सोमनाथ होरे होता है जो चुपचाप शांति निकेतन में पसीना बहा रहा होता है। हर सत्यजीत रे के पीछे एक ऋत्विक घटक होता है, जो शराब पी-पीकर मौत को गले लगा लेता है, क्योंकि सफलता का वरदहस्त दोनों पर समान रूप से नहीं पड़ा। सुनील गंगोपाध्याय जैसे हर सफल उपन्यासकार के समय में नाली में पड़ा शक्ति होता है, जो रवींद्रनाथ टैगोर के बाद लिखी महानतम पंक्तियां बुदबुदा रहा होता है। हर आरके लक्ष्मण के साथ उतने ही प्रतिभाशाली मारियो होते हैं, जिन्हें अपनी प्रिय मुंबई छोड़कर गोवा जाना पड़ा, क्योंकि वे किराया नहीं चुका सकते थे। ऐसा होता है। लोग जिंदगी में तरह-तरह के चुनाव करते हैं। ये चुनाव एक सरल-सा प्रश्न उपस्थित करते हैं : आप अपनी शर्तों पर जिंदगी जिएंगे या सफलता का पीछा करेंगे? और आज सफलता उतनी ही उबाऊ है, जितना धनी होना।

आज हम सब में थोड़ी-सी बनिया बुद्धि है। इसलिए नहीं कि हम ऐसा होना चाहते हैं। हर कोई चेतन भगत, सुबोध गुप्ता या रोहित शेट्‌टी नहीं हैं। वे जो कर रहे हैं उसमें अच्छे होंगे, लेकिन वे पैसा कमाने में बेहतर हैं। सौमित्र चटर्जी कभी रजनीकांत नहीं बनना चाहते थे। खुदा का शुक्र है। उन सारे लोगों के लिए ईश्वर को धन्यवाद जिन्होंने जिंदगी में अजीब विकल्प चुने, बादल सरकार या महाश्वेता देवी जैसे लोग और महान कला, संगीत, नाट्य, सिनेमा, साहित्य, काव्य निर्मित किया। वे ही हैं, जिन्होंने इस राष्ट्र का निर्माण किया है।

आज जब हमारा देश आजादी के 70वें वर्ष में है तो सरकार कैम्पस में विद्रोही तेवर खारिज करती है। उसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर संदेह है। ग्रीनपीस के सामने समस्याएं हैं तो एमनेस्टी इंटरनेशनल तकलीफ मंे है। दलित असुरक्षित हैं तो अल्पसंख्यक भी। बुद्धिजीवी, उदारवादी, जो कभी हमारे समाज की रीढ़ हुआ करते थे, उन्हें गहरे अविश्वास से देखा जाता है। आज लोगों के बीच होने वाली सारी चर्चा पैसे, टैक्स और आर्थिक सुधार को लेकर हो रही है। मैं मानता हूं कि यह सब महत्वपूर्ण है, ठीक उसी तरह जैसे मुझे पक्का पता है कि नई व्यवस्था में बनिया बुद्धि का ही शासन है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
प्रीतीश नंदी
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता
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