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पंजाब में एक हताश पीढ़ी का भटकाव

8 वर्ष पहले
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वह महज बीस साल की है : पतली-दुबली, पीली, भावशून्य और विचारहीन आंखें, छोटी सी दुखभरी जिंदगी के अंत या उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। जब वह बच्ची थी उसके पिता नशे की भेंट चढ़ गए। उसकी मां को पिता के छोटे भाई के साथ शादी करने को मजबूर कर दिया गया। वह भी नशे का आदी हुआ और कुछ साल बाद चल बसा।
उसका भाई उससे कुछ ही साल बड़ा था। वह किशोर होने से पहले ही बाप की तरह व्यवहार करने लगा था। उसकी मां ने 17 की होते ही उसकी शादी कर दी। लेकिन जल्द ही इस लड़की को पता चल गया कि उसका पति भी नशा करता है।
अमृतसर शहर के मकबूलपुरा की वर्किग क्लास की बस्ती में कई सौ पत्नियों, बेटियों, माताओं और बहनों की तरह वह भी कड़ी मेहनत की उम्रकैद काट रही है।
वह लोगों के घरों में बर्तन मांजती है। जब 1999 में एक पत्रकार वरिंदर वालिया ने देखा कि इसी इलाके में तीन साल में 30 महिलाएं विधवा हो गई हैं तब उन्होंने इसे ‘विधवा कॉलोनी’ नाम दे दिया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यहां 330 विधवाओं के नाम दर्ज किए। सभी उस जहर और नशे के हमले में जान गंवा बैठे जो पंजाब के गौरव की आत्मा में प्रवेश कर चुका है। इनमें से कुछ को पंजाब सरकार 250 रुपए की पेंशन भी दे रही है।
पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट में दिए एक हलफनामे में कबूल किया है कि ग्रामीण पंजाब के दो-तिहाई घरों में कम से कम एक पुरुष नशे का आदी है। प्रशासन भी इस जानलेवा सामाजिक महामारी के खिलाफ अनिच्छापूर्वक जागरूकता अभियान चला रहा है। राज्य भर में 51 केंद्रों पर करीब 500 लोगों का इलाज चल रहा है। संकट के लिहाज से यह बहुत कम है। लेकिन बड़ी संख्या उनकी है जो अवैध केंद्रों में अप्रशिक्षित लोगों के चंगुल में फंसते हैं। वहां उन्हें जंजीर से बांधा और पीटा जाता है।
पंजाब भर में आज बुजुर्ग इस पूरी पीढ़ी की हानि का शोक मना रहे हैं। कहा जाता है कि पंजाब भारतीय शहरों और विदेशों के लिए अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थो का परिवहन मार्ग है। लेकिन जल्द ही यह गंतव्य भी बन गया क्योंकि यहां के युवाओं ने नशे के उपयोग और उसकी तस्करी के तरीके सीख लिए। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुमान से देश में नशे के आदी लोगों की संख्या में पंजाब शीर्ष से दूसरे नंबर पर है। ये चरस, देसी शराब, स्मैक, हेरोइन, उत्तेजक दवाएं, गांजा और यहां तक कि छिपकली की पूंछ का सेवन भी करते हैं।
नशे का शिकार ज्यादातर लोग जवानी में उस समय होते हैं जब उन्हें काम करना चाहिए। इसकी जगह वे बिना विचारे इंजेक्शनों का आदान-प्रदान करते हैं, कभी-कभी एक दिन में 100 गोलियां खा जाते हैं, अपना खून बेचते हैं, चोरी करते हैं, कर्ज में फंसते हैं, अपनी पत्नियों और माताओं से वह रकम छीन लेते हैं जिनसे इनके परिवारों के पेट भरते, अपने घर तक बेच देते हैं। बच्चे भूख और डर के बीच अपने पिता को बर्बाद होते देखते हैं। लेकिन दुख की बात है कि बच्चे अपने पिता की नकल करते हैं। समाजशात्री अमनप्रीत सिंह कहते हैं कि नशे के आदी लोगों में से एक तिहाई मानते हैं कि यह लत उन्हें पिता की नकल करते समय लगी।
स्वर्णमंदिर से बहुत दूर नहीं है मकबूलपुरा। यहां हर घर की इस गुमनाम पीढ़ी में लगभग रोज त्रासदी होती है। मुस्लिम आबादी इसे विभाजन के समय खाली कर गई थी। सीमा पार से गरीब हिंदू, सिख शरणार्थी आकर यहां बस गए थे। महिलाएं घरेलू कामकाज करती हैं, पुरुष जब कर सकते हैं तब वे रिक्शा या ऑटो रिक्शा चलाते हैं। लेकिन जैसे ही वे नशे के साम्राज्य में घुसते हैं, काम करना असंभव हो जाता है। औरतें और बच्चे कच्ची शराब बेचते नजर आते हैं और तब वे नशे के व्यापार में ग्रेजुएट हो जाते हैं। यहां छोटे बच्चों को नशेड़ी ग्राहकों से मोल-भाव करते देखना असामान्य नहीं है। कई जल्दी स्कूल छोड़कर परिवार चलाने में मां का हाथ बंटाने के लिए पैसा घर लाने लगते हैं।
इन छोटे बच्चों की दुर्दशा से द्रवित होकर एक स्थानीय शिक्षक अजित सिंह ने उनके लिए पढ़ने और नशे से दूर रहने के लिए एक स्वर्ग सा स्कूल तैयार किया है। लोग इन्हें मास्टरजी के नाम से जानते हैं। उन्होंने यह कदम कई साल पहले उठाया जब उनके दस साल के बेटे ने ‘गिलासी’ खरीदने के लिए पैसे मांगे। यह देसी शराब का गिलास है जो मकबूलपुरा की सड़कों पर खुले आम बिकती है।
मास्टरजी ने अपने बेटे को जी जान से बचाने की तो कोशिश की ही, साथ ही मकबूलपुरा के उस उम्र के बाकी बच्चों को भी बचाने की ठानी। उनकी पत्नी अमनदीप और वे सरकारी शिक्षक थे। उन्होंने सारा सामान घर के एक कमरे में किया और बाकी कमरे क्लासरूम में बदल दिए। सरकारी नौकरी से लौटने के बाद उन्होंने घर पर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। पढ़ाई-लिखाई के माहौल से दूर रहे बच्चों को नशे-पत्ते से दूर कुछ घंटे का यह माहौल बहुत अच्छा लगा। साल गुजरते रहे, दान और इनाम आते रहे। शिक्षक दंपती ने और क्लासरूम बना लिए। आज वे 400 से ज्यादा बच्चों को पढ़ा रहे हैं उनकी देखभाल कर रहे हैं। उनके पास दूसरे शिक्षकों को रखने के लिए भी पैसा है, ये नशे की लत में डूबे परिवारों के बचे युवा हैं। उन्हें गर्व है कि इनकी बेंचों पर बैठे ज्यादातर बच्चे नशे में नहीं डूबे।
इन्होंने अपने कई विद्यार्थियों को नशा मुक्ति दस्ते का वालंटियर बनाया। जो छुट्टियों में राज्य भर में घूमते हैं, युवाओं को नशे के खतरे से आगाह करते हैं। बताते हैं कि कैसे यह सिर्फ नशेबाज को ही नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार को विपत्तियों, हिंसा, बेरोजगारी और अपराध के दलदल में फंसाता है। मैं इनमें से कुछ युवाओं से मिला हूं। वे अपने पड़ोस में बढ़ते अपराध की चर्चा करते हैं। नशे का उपयोग करने वाले कैसे मोटरसाइकिल पर जाते हैं। नशा खरीदने के लिए चेन या पर्स छीनकर भागते हैं। भ्रष्ट पुलिस वालों, शराबी पिता, भाई और चाचा-मामा, असुरक्षित हिंसक माहौल वाले घर और वंचित भयावह बचपन की बात करते हैं।
लेकिन वे अपने सपने की बात भी करते हैं- नशे के खिलाफ संघर्ष के लिए पुलिस में जाना, आईएएस अफसर, डॉक्टर और टीचर बनना। बाकी घरों में माता-पिता अपने बच्चों को पालते बड़ा करते हैं, यहां बच्चे अपने बड़ों को बचाने की योजना बनाते हैं। पंजाब ने एक पीढ़ी उग्रवाद में गंवा दी और अगली पीढ़ी नशे में। संभव है तीसरी पीढ़ी आत्मा के भीतर तक घुस चुकी इस बीमारी का उपचार करे।
हर्ष मंदर
लेखक डायरेक्टर, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज हैं।