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ईरान में शांति से हमें तिहरा लाभ

8 वर्ष पहले
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आखिर ईरान अपने यूरेनियम संवद्र्धन कार्यक्रम को बंद करने पर राजी हो गया। यूरोपीय संघ के देश ब्रिटेन, फ्रांस व जर्मनी और अमेरिका, रूस व चीन के साथ हुई उसकी बातचीत सार्थक साबित हुई। सहमति तो नवंबर में ही कायम हो गई थी, लेकिन ईरान ने उस पर 20 जनवरी से अमल प्रारंभ कर दिया है। समझौते के अनुसार ईरान पांच प्रतिशत से अधिक यूरेनियम संवद्र्धन नहीं करेगा और पहले से मौजूद 20 प्रतिशत संवद्र्धित यूरेनियम को पूरी तरह समाप्त करेगा। वह अराक के हैवी वाटर प्लांट को भी आगे और विकसित नहीं करेगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों की निगरानी बढ़ाई जाएगी, जिसमें नांताज और फरादो के परमाणु ठिकानों की प्रतिदिन निगरानी भी शामिल है।


बदले में ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों में तो ढील मिलेगी ही, तेल के वर्तमान स्तरों तक खरीद की अनुमति भी मिल जाएगी। उसकी विमान सेवाएं भी प्रतिबंध मुक्त होंगी और अपने वादों पर अमल करने पर उसे 4.2 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त करने की अनुमति मिलेगी। ईरान के इस कदम से मध्य-पूर्व में शांति की राह आसान हुई है। ईरानी बम का हौवा पिछले कई वर्षों में पूरी दुनिया के सामने खड़ा किया गया। यह भी सही है कि चाहे ईरान इसे शांतपूर्ण उद्देश्यों से जोड़कर पेश करता रहा हो, लेकिन वास्तव में वह इजरायल के बम की ताकत के साथ-साथ पाकिस्तान के सुन्नी बम की ताकत का विकल्प शिया बम के रूप में पेश करने की ख्वाहिश रखता था।


सवाल उठता है कि जिन देशों ने ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करने पर मजबूर किया उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ यही एकजुटता क्यों नहीं दिखाई, जबकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट सहित तमाम संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि इस समय पाकिस्तान के पास सौ के करीब नाभिकीय हथियार हैं जिन्हें वह लगातार बढ़ाने की कोशिश में है। जबकि वास्तविकता यह है कि ईरान के परमाणु बम उतने असुरक्षित साबित नहीं होते जितने कि पाकिस्तान के हैं, क्योंकि पाक एटमी हथियार आतंकियों की पहुंच से बहुत दूर नहीं हैं।


बहरहाल, अब ईरान को अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण का अवसर प्राप्त होगा और भारत सहित तमाम देश भी राहत की सांस ले सकेंगे। हालांकि एशिया में स्थायी शांति पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम पर पाबंदी के बिना संभव नहीं हो सकती। ईरान से आर्थिक प्रतिबंध उठने का भारत को तिहरा लाभ हो सकता है। एक तो यह कि ईरान से भारत का तेल आयात घटकर 10 प्रतिशत से भी नीचे चला गया था, जो ऊपर उठेगा। चूंकि ईरान का तेल सस्ता है, इसलिए वहां से तेल मंगाना भारत के लिए फायदेमंद होगा। फिर ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन डालने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। भारत के तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) और इंडियन ऑइल जैसी कई कंपनियों ने ईरान में भारी निवेश कर रखा है, लेकिन प्रतिबंधों के कारण कार्य शुरू नहीं हो पा रहा था, अब वह शुरू हो जाएगा।


लेखक आर्थिक एवं विदेशी मामलों के विशेषज्ञ हैं।
raheessingh@gmail.com