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न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम

9 वर्ष पहले
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न बहारों की बात करनी है, ना नजारों की बात करनी है,
गर गहरे दरिया को पार करना है, किनारों की बात करनी है।
रेल मंत्री पवन बंसल ने ये शेर पढ़ा ज़रूर पर इसकी गहराइयों में नहीं गए। दरिया पार करने का इरादा नहीं दिखाया, किनारों की बात करते रहे। किनारे से ही उनका भाषण अंग्रेजी में था, जिसके सफ़र में और हिंदी के सफ़र में नुक्तेभर का फर्क नहीं पर मतलब में आग-पानी का। देश को उम्मीद थी कि उनके हिंदी वाले सफ़र में उन्हें अंग्रेजी वाला सफ़र नहीं करना पड़ेगा। उस उम्मीद पर रेल नीर फेर दिया बजट ने।
जनवरी में ही बढ़ाए किराए को बंसल ने फरवरी में नहीं बढ़ाया। बस किस्म-किस्म के चार्ज लगाए, उस पर सरचार्ज लगाए, जो आगे बढ़ेगा। बढ़ता जाएगा। किश्तों में ज़ख्म ताकि आप याद न करें, मुश्तों में तोहफे ताकि आप भूल न जाएं। पवन बंसल का पहला बजट रेल के खाने जैसा था। प्लास्टिक में पैक, ठंडा, नरम।
जो करना था, वो नहीं किया। जो ज़रूरी नहीं था, वह ज़रूर किया। पानी की बोतल बनाने वाले हज़ारों हैं पर रेलवे छह नए रेल नीर प्लांट लगाएगी। लोकसभा में हजारों करोड़ के घाटे की दुहाई दी पर 106 नई ट्रेनें, नई रेलवे लाइनें बिछाने का वादा भी कर दिया। पहले के वादों को पूरा नहीं कर पाने के लिए माफ़ी नहीं मांगी। पूर्व मंत्रियों के किए गए कुछ वादों की छटनी भी कर दी।
अपने भाषण का श्रीगणोश उन्होंने राजीव गांधी को नमन कर किया और फिर क्रिस्टीन वेदरली की अंग्रेजी कविता की पंक्तियों से रेल का रोमांस लाए। फिर यथार्थ के धरातल पर आए और आंकड़े गिनाए। आंकड़े चूंकि प्रकृतिवश गंभीर होते हैं, इसलिए सारा सदन शांत रहा। जब तक सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र में एक और रेल कारखाना लगाने की घोषणा नहीं की गई।
रायबरेली का नाम सुनते ही विपक्ष के लोग हंगामे पर उतर आए। इस सूरत का पवन बंसल ने दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से सामना किया ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’ हंगामा करने का मकसद दिल में लिए विपक्ष के लोग समझ नहीं पाए, कि ये मकसद बंसल का हो भी कैसे सकता है! किंकर्तव्यविमूढ़। यह कहना गलत होगा कि वह आने वाले शेरों की भयावहता से डर गए क्योंकि आगे एक के बाद एक घोषणाएं आईं।
ट्रेनों में अनुभूति नाम के नए कोच लगेंगे, जो लग्जरी की अनुभूति देंगे, ताकि दुर्घटना हो तो चलता आदमी लग्जरी में घायल हो। दुर्घटनाएं इसलिए होंगी क्योंकि रेलवे सुरक्षा के लिए आवश्यक आधुनिकीकरण को फिर शंटिंग यार्ड में भेज दिया गया। मानव रहित फाटकों पर चिंता व्यक्त की, पिछले मंत्रियों की तरह घोषणाएं भी कीं पर प्राथमिकता के बारे में इरादा व्यक्तनहीं होने दिया। जब वह दिल्ली में भाषण पढ़ रहे थे, मध्य प्रदेश के गुलाबगंज स्टेशन को आग के हवाले किया जा चुका था। दो बच्चों की ट्रेन से कटकर मौत के बाद फूटे गुस्से का शिकार बने रेलवे के कर्मचारी।
बेखबर बंसल घोषणा करते गए। एक्सप्रेस ट्रेनों में फ्री वाई-फाई की सुविधा होगी, ताकि आप तत्काल मित्रों को ई-मेल से बता सकें कि आपने अपने गुड़गुड़ाते पेट पर कैसे नियंत्रण रखा है क्योंकि टॉयलेट की हालत के बारे में सोचकर आपकी हालत बिगड़ जाती है। सरकार निर्मल भारत योजना चला रही है, ताकि खुले में शौच का दाग मिटे। पर केमिकल टॉयलेट पर रेल बजट चुप। रेलवे के ट्रैक्स देश के सबसे बड़े खुले शौचालय हैं। महाशक्ति का दंभ भरने वाले देश के वर्ल्ड-क्लास स्टेशनों पर मानव मल पर्यटकों के आगे भारत की छवि को मलिन करता रहेगा। ट्रेन के अंदर शौचालय के नाम पर 2013-14 में भी एक बड़ा सुराख भर होगा, बाहर भले लिखा हो पाश्चात्य शैली।
हालांकि, बजट ने रेल टिकट के दलालों की नींद उड़ा दी है। अब दलालों को बल्क बुकिंग आधी रात 12:30 बजे से ही शुरू करनी होगी। दलालों से मुक्ति का कोई प्रावधान नहीं। इंटरनेट टिकट बुकिंग व्यवस्था दुरुस्त की जा रही है, ताकि हर मिनट 7260 टिकट बुक हो सकें। आसान हो जाएगा तो इंटरनेट पर टिकट बुक कर पाने वाले वीरता पुरस्कार के लिए दावा नहीं ठोंक पाएंगे। सफाई पर ध्यान देंगे ऐसा कहा, गंदगी पर कुछ नहीं। चूहे पहले की तरह फस्र्ट क्लास के डिब्बों में यात्रा करते रहेंगे, अगर पैंट्री वालों ने पकड़कर उनकी बिरयानी नहीं बनाई। बड़ा हंगामा हुआ था जब हाल में एक शाकाहारी आदमी को वेज बिरयानी में चूहा मिला था। इस पर नियंत्रण के साथ, बेड रोल की सफाई के लिए छह नई लॉन्ड्री स्थापित होंगी। यानी आप को मिला बेडशीट आप अपने नाक के आसपास भले न ला सकें पर बदन तो ढंक ही पाएंगे। बजट की आबरू और बंसल की नाक सलामत रही जब तक उन्होंने नए ट्रेनों के नाम लेने शुरू नहीं किए थे।
दक्षिण भारतीय शहरों के नामों का उच्चारण करते हुए उनकी जीभ लड़खड़ाती, तो सुषमा स्वराज मुस्कुरातीं, जिन्हें बेल्लारी का उच्चारण आता है। पर इतने सांसद और ट्रेनें बस 67 एक्सप्रेस और 27 साधारण सवारी वाली। जिनके क्षेत्र नहीं सुनाई दिए, वह उठ खड़े हुए। तब जाकर पूरे देश को एहसास हुआ कि ये लोकसभा ही है। इसी शोरोगुल में बंसल ने अंग्रेजी की एक कहावत दोहराई, जिसका मतलब था ‘पेड़ पर बैठे पक्षी को गिरने का डर नहीं सताता, इसलिए नहीं कि उसे पेड़ की शाखा की मजबूती पर यकीन है, बल्कि इसलिए कि उसे अपने पंखों पर भरोसा है।’ राज्यसभा सांसद विजय माल्या की आंखें भर आईं क्योंकि डैनों पर भरोसे की बात से उनका भरोसा कब का उठ चुका है। बहरहाल, लोकसभा में पवन बंसल को अभी पांच पन्ने पढ़ने बाक़ी थे। परंपरा का सम्मान करते हुए मीरा कुमार के ‘बैठ जाइए-बैठ जाइए’ को विपक्ष के सांसदों ने पूरी तरह से अनसुना कर दिया। पवन बंसल क्रिस्टीन वेदरली की कविता की अगली पंक्तियां भी लिख कर लाए थे। उसे पढ़े बिना ही बैठ गए। भाषण अधूरा छोड़ दिया। इस साल के बजट जैसा। साल दर साल भारतीय रेल जैसा।
कमलेश सिंह
स्टेट एडिटर दैनिक भास्कर