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भारत के लिए तीन तरह के सपने

8 वर्ष पहले
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1970 के दशक में व्यवस्था विरोधी हीरो हुआ था, अब 2014 में व्यवस्था विरोधी नेता हुआ है। एक उड़ान के दौरान मैंने जावेद अख्तर से पूछा था कि क्या उन्होंने आपातकाल के पहले के उपद्रवग्रस्त वर्षों की प्रतिक्रिया के रूप में 'एंग्री यंग मैन' की रचना की थी। जावेद साहब मुस्कराकर बोले, 'हमारे दिमाग में राजनीति नहीं थी। हम तो परदे के लिए सिर्फ एक अच्छी हिंदी कहानी लिखना चाहते थे।' फिर जंजीर बनी, अमिताभ बच्चन आए और जैसा कहा जाता है, शेष तो सब इतिहास है।


सलीम-जावेद को चाहे संयोगवश सफलता का मंत्र मिल गया था, लेकिन राजनीति में पूरी सोच-समझ के साथ व्यवस्था विरोधी नेता का उदय हुआ है। फिर चाहे 1970 के दशक में अपनी संपूर्ण क्रांति के साथ आए जयप्रकाश नारायण हों या 1980 के दशक में भ्रष्टाचार विरोध का झंडा उठाने वाले वीपी सिंह। ऐसे नेता के लिए हमेशा जगह रही है, जो व्यवस्था को हिलाना चाहता हो। सिर्फ मौजूदा दौर में हमारे सामने बदलाव के एजेंट की होड़ में तीन नेता है- नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल। इनमें से हर नेता अलग ढंग से यथास्थिति तोडऩे का वादा कर रहा है।

प्रधानमंत्री पद की होड़ में अग्रणी मोदी को लीजिए। भाजपा कार्यकारिणी में उनका भाषण एक रहस्योद्घाटन ही था : उन्होंने एक बार भी 'टीम हिंदुत्व' के वैचारिक एजेंडे का जिक्र नहीं किया। अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर की बजाय मोदी अपने एक घंटे के भाषण के दौरान ज्यादातर भारत के लिए अपने इंद्रधुनषी विजन की ही चर्चा करते रहे : बुलेट ट्रेन से लेकर हर राज्य में आईआईएम और आईआईटी तक। इसकी तुलना गुजरात दंगों के बाद 2002 में निकाली गई 'गौरव' यात्रा के मोदी से कीजिए। तब वे अपने भाषण में अल्पसंख्यक विरोधी जुमलों (हम पांच, उनके पच्चीस) को उदारता से इस्तेमाल करते थे। शासन करने के एजेंडे पर उनके भाषण में ज्यादा कुछ नहीं होता था।
अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार की नई भूमिका में मोदी खुद को पूरी समझबूझ के साथ मौजूदा 'धर्मनिरपेक्ष प्रतिष्ठान' के लिए राजनीतिक व वैचारिक चुनौती के रूप में पेश कर रहे हैं। ऐसा वे अल्पसंख्यकों पर हमले करके नहीं कर रहे हैं।

इसके लिए वे 'चाय वाला' के अपने मूल रूप और 'विकास लाने वाले मुख्यमंत्री' के ट्रैक रिकॉर्ड को मशहूर नाम व विशेषाधिकार वाले मौजूदा सत्तासीन लोगों के परिप्रेक्ष्य में रखकर विरोधाभास दिखा रहे हैं। खास बात तो यह है कि विकास के बाजारवादी गुजरात मॉडल पर जोर देकर वे धीरे-धीरे खुद को संघ परिवार से भी दूर ले जा रहे हैं। निश्चित ही उन्हें प्रवीण तोगडिय़ा और विहिप या स्वदेशी जागरण मंच के लोगों की बजाय टेक्नोक्रेट और उद्योगपतियों के साथ देखे जाने की ज्यादा संभावना है। गुजरात में तो उन्होंने अपने व्यक्तित्व का हौवा खड़ाकर कट्टरवादी हिंदुत्व ब्रिगेड को ध्वस्त भी कर दिया है। अब वे इसे राष्ट्रीय स्तर पर दोहराना चाहते हैं। इसीलिए उनके उदय से भाजपा का एक तबका उतना ही घबराया हुआ है जितनी कांग्रेस।


राहुल गांधी भी भीतर से कांग्रेस की 'पुरानी व्यवस्था' को चुनौती दे रहे हैं। मोदी की तरह कांग्रेस अधिवेशन में राहुल का भाषण आंखें खोल देने वाला था। इसे आसानी से उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ भाषण कहा जा सकता है। इसमें वे 'सत्ता जहर है' की ऊंची बातों से हटकर इस वास्तविकता को स्वीकार करते नजर आए कि व्यवस्था बदलने के लिए सत्ता जरूरी है। उन्होंने राजनीति में नीचे से ऊपर जाने की बात कही। कार्यकर्ता को अधिकार देने और युवाओं के लिए दरवाजे खोलने पर जोर दिया। दागी नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश को बकवास बताना, लोकपाल विधेयक पर जोर देना, महाराष्ट्र सरकार द्वारा आदर्श घोटाला रिपोर्ट पर कार्रवाई न करने की आलोचना, खुद को ऐसे बेचैन युवा योद्धा के रूप में पेश करने की कोशिश है जो जंग खाती पार्टी में ताजगी लाना चाहता है।

और फिर केजरीवाल हैं, जो खुद को सड़कों पर संघर्ष करने वाले आंदोलनकारी के रूप में पहले देखते हैं, नेता तो बहुत बाद की बात है। लोकपाल आंदोलन के दौरान उन्होंने खुद को भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग के खिलाफ स्थापित किया ('सब नेता चोर हैं' यह लोकप्रिय नारा था)। अब मुख्यमंत्री के अपने नए अवतार में अलग तरह के नेता होने की छवि बनाने में लगे हैं। ऐसा नेता जो वीआईपी संस्कृति नहीं चाहता, जो सरकार को लोगों तक ले जाना चाहता है। फिर चाहे सत्ता की दहलीज पर धरना ही क्यों न देना पड़े। गले में पड़ा मफलर, हमेशा बनी रहने वाली खांसी, राजपथ पर सोना, वैगनआर चलाना यह सब खुद को अन्य नेताओं से अलग दिखाने के लिए है। आम आदमी का ऐसा प्रतिनिधि जो खास आदमी की संस्कृति से संघर्ष कर रहा है।

इस तरह आपके सामने प्रतिष्ठान विरोधी नायकों की रोचक तिकड़ी है : एक प्रचारक हैं जो ऐसे माचो मैन के रूप में उभरने का प्रयास कर रहे हैं जिसके पास हर राष्ट्रीय समस्या का समाधान है। एक वंश परंपरा से आया नेता है जो उसे निर्मित करने वाली पार्टी की इमारत को ही ढहाना चाहता है। और एक है स्वघोषित अराजकतावादी, जो राजकीय व्यवस्था को पुनर्निर्मित करने की कोशिश करने से पहले उसे नष्ट करना चाहता है। इस तिकड़ी को यह अहसास हो गया है कि परंपरागत राजनीति अब ज्यादातर मतदाताओं को अस्वीकार्य है। यही वजह है कि उन्हें राजनीति को पुनर्परिभाषित करना होगा।


राहुल के सामने बुढ़ाती पार्टी को यह अहसास दिलाने की चुनौती है कि चुनाव अब लुटियन्स दिल्ली के ड्राइंग रूम में साजिशें रचकर नहीं लड़े जा सकते। मोदी की चुनौती संघ परिवार को अधिक व्यावहारिक राजनीति के पक्ष में वैचारिक कठोरता छोडऩे के लिए राजी करना है। और केजरीवाल का लक्ष्य एक ऐसे समूह में कुछ व्यवस्था और एकरूपता स्थापित करना है, जो खुद को 'शिवजी की बारात' बताकर खुश होता है।


मोदी को पहले ही कुछ सफलता मिल गई है, क्योंकि संघ परिवार सत्ता में लौटने के लिए बेताब है और इसलिए एक आदमी की अदम्य महत्वाकांक्षा के आगे हिंदुत्व के एजेंडे की बलि चढ़ाने को तैयार है। राहुल के लिए शायद काफी देर हो चुकी है और खुद को 10 साल के यूपीए शासन के बोझ से पूरी तरह अलग नहीं कर सकते। केजरीवाल तो खुद ही अपने हाईकमान हैं, लेकिन वे बहुत जल्दी में हैं, इसलिए सुविचारित दीर्घावधि की रणनीति की बजाय नाटकबाजी की ओर उनका झुकाव ज्यादा है।


हालांकि जो स्पष्ट है, वह यह कि युवा और बेचैन भारत बदलाव के लिए उत्सुक है। बदलाव का वादा चाहे महत्वाकांक्षी भारत के मोदी के सपने का हो या राहुल के 'सर्वसमावेशी भारत' या केजरीवाल के एंग्री इंडिया का हो। जो भी अपने सपने को सबसे अच्छे तरीके से लोगों तक पहुंचा सकेगा वही 2014 की लड़ाई जीत लेगा।


राजदीप सरदेसाई- आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर इन चीफ

rajdeep.sardesai@
network18online.com