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डाउनलोड करेंभारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन का एक प्रसंग है। बात आजादी के पहले की है। अंग्रेजों के प्रति गुस्सा सभी के मन में था। किंतु विरोध का साहस कम ही लोगों में था। यूं भी भारतीय अपनी सहनशीलता के कारण जाने जाते थे। अंग्रेजों ने उनके इस गुण का भरपूर फायदा उठाया। वे उन पर अत्याचार करने में जरा भी नहीं चूकते थे।
जहां भी और जितना भी परेशान कर सकते थे, अवश्य करते थे। एक दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद नौका में बैठकर अपने गांव जा रहे थे। उनके समीप ही एक अंग्रेज अधिकारी बैठा था। कुछ देर बाद उसने सिगरेट पीना शुरू कर दीं। राजेंद्र बाबू सहित नौका में बैठे सभी लोगों को सिगरेट के धुएं से तकलीफ होने लगी, किंतु शासक-वर्ग का होने के कारण किसी ने विरोध नहीं किया। आखिरकार राजेंद्र बाबू से रहा नहीं गया।
वे बोले- क्रये जो सिगरेट आप पी रहे हैं, क्या आपकी है?ञ्ज अंग्रेज अधिकारी ने तुनककर कहा- क्रमेरी नहीं, तो क्या तुम्हारी है? तुम मूर्ख हो, जो ऐसा प्रश्न कर रहे हो।ञ्ज तब राजेंद्र बाबू बोले- क्रतो फिर यह धुआं भी आपका ही है, इसे दूसरों पर क्यों फेंक रहे हो? इसे भी अपने पास संभालकर रखो।ञ्ज राजेंद्र बाबू का सटीक जवाब सुनकर अंग्रेज अधिकारी सकपका गया।
उससे कुछ बोलते नहीं बना। उसने सिगरेट तत्काल बुझा दी और शेष सफर चुपचाप तय किया।विरोध के अनेक ऐसे अवसरों पर हम लोग प्राय: विवाद के भय से अथवा क्रहमें क्या करनाञ्ज के अनुत्तरदायी भाव को पाले हुए चुप रहते हैं, किंतु क्रअनुचितञ्ज का विरोध प्रत्येक स्थान पर उचित है, क्योंकि इसी से समाज एक बड़े परिवार का रूप लेता है।
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