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कर्नाटक के नतीजों का असली सबक

8 वर्ष पहले
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दक्षिण भारत के एकमात्र गढ़ में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अंदरूनी कलह ने भाजपा को धराशायी किया।
कर्नाटक की जनता ने अपने आस-पास के भ्रष्टाचार को दंडित किया और दिल्ली के दूरस्थ भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर दिया। दूर के भ्रष्टाचार पर पास का भ्रष्टाचार भारी पड़ गया। यही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी हुआ।


कर्नाटक की जीत पर कांग्रेसियों का मुग्ध हो जाना स्वाभाविक है लेकिन वास्तव में क्या यह कांग्रेस की जीत है? सच्चाई तो यह है कि कर्नाटक के चुनाव में न तो कांग्रेस जीती है और न ही भाजपा हारी है। इस चुनाव में येदियुरप्पा ही जीते हैं और वे ही हारे हैं। येदियुरप्पा ही इस चुनाव के नायक और खलनायक, दोनों थे।

अच्छा, आप ही बताइए कि कर्नाटक के चुनाव-परिणाम से सबसे ज्यादा खुश कौन होगा? कौनसा ऐसा नेता है, जिसकी निजी इच्छा सबसे ज्यादा पूरी हुई है? वह है, येदियुरप्पा! येदियुरप्पा भाजपा को मजा चखाना चाहते थे। सो उन्होंने चखा दिया। उसे 110 से 40 पर उतार दिया।

भाजपा को पता था कि वह दुबारा सत्तारूढ़ नहीं होनेवाली है लेकिन उसकी इतनी दुर्गति हो जाएगी कि वह जनता दल (स) के बराबर नप जाएगी, यह उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। भाजपा ने कर्नाटक में अपना पूरा जोर आजमा लिया। अपने हर छोटे-बड़े नेता को दांव पर लगा दिया लेकिन उसे वोट जनता दल (स) से भी कम मिले। येदि की पार्टी ‘कर्नाटक जनता पक्ष’ को सिर्फ छह सीटें मिलीं।


यदि येदियुरप्पा और भाजपा साथ होते तो उन्हें कुल 46 सीटों की बजाय 97 सीटें मिलतीं, क्योंकि 51 सीटों पर येदि और भाजपा के वोट मिलकर कांग्रेसी उम्मीदवारों से ज्यादा थे। यदि भाजपा को 97 सीटें मिलतीं तो जाहिर है कि कांग्रेस की 51 सीटें कम हो जातीं। उसका बहुमत खटाई में पड़ जाता।

उसे सरकार बनाने के लिए जनता दल (स) के नेता एच डी कुमारस्वामी की शरण में जाना पड़ता। लेकिन कांग्रेस को येदि का आभारी होना चाहिए कि उन्होंने ऐसी नौबत नहीं आने दी। भाजपा के कुछ नेताओं ने मुझसे कहा कि येदि हमारी पार्टी का विभीषण सिद्ध हुआ। मैंने उनसे कहा कि वे आपकी पार्टी के विभीषण और रावण दोनों ही थे।

पहले उन्होंने रावण का रोल अदा किया और फिर विभीषण का! केन्द्र और राज्यों की राजनीति में बागी नेता कई और भी हुए हैं लेकिन येदियुरप्पा ने अब तक के सब रिकार्ड तोड़ दिए हैं। वे सबसे बड़े खलनायक सिद्ध हुए हैं।


येदि ने मुख्यमंत्री बनते ही उन सब आदर्शो और सिद्धांतों को धता बता दिया, भाजपा जिनका नगाड़ा पीटती रहती है। वंशवाद और परिवारवाद की विष-बेल जितनी तेजी से कर्नाटक में फली-फूली, बहुत कम अन्य राज्यों में फली-फूली। बेल्लारी-बंधुओं और येदियुरप्पा-परिवार ने जो लूट-खसोट मचाई, क्या उसके बारे में भाजपा के केंद्रीय नेता अनजान थे? सबको सब कुछ पता था लेकिन शेर के मुंह में हाथ कौन डाले?

कर्नाटक की जनता भी दांतों तले उंगली दबाए सब कुछ देखती चली जा रही थी। वह क्या कर सकती थी। भाजपा के केंद्रीय नेता जरुर कुछ कर सकते थे। लोहा गरम था, उस समय चोट कर देते तो जनता भी वाह, वाह करती लेकिन उनकी नींद तब खुली, जब येदि-कुनबे के कुकर्मो के ढोल जोर-जोर से बजने लगे। जब मुख्यमंत्रीजी के जेल जाने की नौबत आ गई, तब उन्हें हटाया गया और तब भी उन्हें पार्टी की लगाम सौंप दी गई।

एवजी मुख्यमंत्री को कठपुतली की तरह बिठा दिया गया। याने कर्नाटक की जनता को भाजपा ने यह संदेश दे दिया कि येदि ही भाजपा है और भाजपा ही येदि है। ये चुनाव-परिणाम इसी संदेश का परिणाम हैं। येदि के अलग पार्टी बनाने से क्या र्फक पड़ा? भाजपा की भ्रष्ट छवि पत्थर की लकीर की तरह जनता के मानस-पटल पर अंकित हो गई। जनता ने भाजपा और येदि, दोनों को ही कड़क सबक सिखाया। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे। दोनों पिटे।


भाजपा के नेता अब चाहे कहते रहें कि वे कर्नाटक में आपसी झगड़े की वजह से हार गए लेकिन सच्चाई का उन्हें पता है। वे जानते हैं कि उनकी हार का कारण भ्रष्टाचार है। यह वही भ्रष्टाचार है, जो केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के गले में सांप की तरह लिपटा हुआ है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर प्रहार करते समय भाजपा के नेताओं की जुबान लड़खड़ाती क्यों रहती थी? क्योंकि कर्नाटक का भ्रष्टाचार उनके सिर पर चढ़कर बोलता था।

तो अब कर्नाटक की जनता को दोष क्यों दिया जाए? कर्नाटक की जनता ने अपने आस-पास के भ्रष्टाचार को दंडित किया और दिल्ली के दूरस्थ भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर दिया। दूर के भ्रष्टाचार पर पास का भ्रष्टाचार भारी पड़ गया। यही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी हुआ। इन राज्यों के स्थानीय भाजपा नेताओं का भ्रष्टाचार उन्हें ले डूबा।


कुछ कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि यह कांग्रेस की विचारधारा की विजय है और 2014 के आम-चुनावों का पूर्व-संकेत है। यदि सचमुच वे ऐसा ही समझ रहे हैं तो हमें उनकी बुद्धि पर तरस खाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। वे क्यों भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार की जिस आग ने 2013 में कर्नाटक की भाजपा का भुर्ता बना दिया है, वही आग 2014 में दिल्ली में भी जलेगी? क्या वह कांग्रेस का कचूमर नहीं निकाल देगी?

कर्नाटक में कांग्रेस को अपनी जीत से फूल कर कुप्पा होने की जरूरत नहीं है बल्कि भाजपा की भूलों से सबक लेने की जरूरत है। उन्हें जी-तोड़ कोशिश करनी होगी कि 2014 के आम-चुनावों में कांग्रेस की वैसी ही दुर्गति न हो जाए, जैसी कि कर्नाटक में भाजपा की हुई है।


कर्नाटक की हार का ठीकरा नरेंद्र मोदी के सिर फोड़ना वैसा ही है, जैसे उसकी जीत का सेहरा राहुल या सोनिया के सिर बांधना है। मोदी की तीन जबर्दस्त जनसभाओं के मुकाबले कांग्रेस-अध्यक्ष की फीकी सभाओं में खिसियाहट पैदा होना स्वाभाविक है लेकिन कर्नाटक के चुनावों ने यह सिद्ध किया है कि दोनों तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के पास अपना कोई मुद्दा नहीं है।

दोनों के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है, जिसके दम पर वे करोड़ों मतदाताओं के मन में किसी आशा का संचार कर सकें और उसके आधार पर वोट पा सकें। दोनों पार्टियां उन्हीं मुद्दों पर एक-दूसरे के सिर धुनती रहती हैं, जो जनता ने उनकी झोली में डाल दिए हैं। सरकारों के भ्रष्टाचार से जनता दुखी है और यही मुद्दा जनता ने ज्वलंत बना दिया है। इसी मुद्दे के आधार पर कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार सेंत-मेंत बन गई।

अगर यह मुद्दा जनता के दिमाग पर सवार नहीं होता तो क्या कांग्रेस को 121 सीटें मिल सकती थीं? जातियों, नेताओं और क्षेत्रों में बंटी स्थानीय कांग्रेस कर्नाटक को कितना निहाल करेगी, भगवान ही जाने लेकिन डर यही है कि 2014 में केंद्र में कांग्रेस का जो विकल्प खड़ा होगा, वह कहीं कर्नाटक के विकल्प से भी कमजोर न हो।

वेदप्रताप वैदिक
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।