कानून और अधिकार : अदालतों की कार्यवाही सीधे देखने का अधिकार / कानून और अधिकार : अदालतों की कार्यवाही सीधे देखने का अधिकार

डॉ. मनोज कुमार

Apr 06, 2017, 10:39 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है कि अदालतों में कैमरे लगाए जाएं। इससे जनता अदालतों की कार्यवाही को देख सकेगी। कई विकसित देशों में इस तरह की अनुमति नहीं है, लेकिन हमारे देश में इसकी लंबे समय से मांग हो रही है। यह फैसला नागरिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है कि अदालतों में कैमरे लगाए जाएं। इससे जनता अदालतों की कार्यवाही को देख सकेगी। कई विकसित देशों में इस तरह की अनुमति नहीं है, लेकिन हमारे देश में इसकी लंबे समय से मांग हो रही है। यह फैसला नागरिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।
न्यायपालिका कई वर्षों से अदालतों में कैमरे लगाने के खिलाफ रही है, लेकिन अंतत: पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने सीसीटीवी कैमरा लगाने के आदेश दिए। इसमें ऑडियो रिकॉर्डिंग नहीं हो सकेगी। देश के समस्त राज्यों के दो जिलों और केंद्र शासित प्रदेशों की अदालतों में अदालती कार्यवाही को सीसीटीवी कैमरे के माध्यम से दिखाया जाएगा। यह अभूतपूर्व आदेश शीर्ष अदालत के न्यायाधीश जस्टिस आदर्श के गोयल और जस्टिस उदय यू ललित की खंडपीठ ने दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने देश के 24 हाईकोर्ट को भी निर्देश दिए हैं कि सभी राज्यों में वे यह सुनिश्चित करें कि कम से कम दो जिलों में जिला और सत्र अदालतों में सीसीटीवी कैमरे कोर्टरूम में लगाए जाएं। यह कार्य तीन माह में हो जाना चाहिए।
इसके पहले सीसीटीवी लगाने संबंधी कई याचिकाओं को अदालत ने खारिज कर दिया था। इतना ही नहीं विधि आयोग ने भी अपनी सिफारिशों में कहा था कि अदालतों में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की जानी चाहिए। उसे भी नहीं माना गया था। लेकिन पिछले दिनों दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब देखना यह है कि यह पहला कदम किस तरह से काम करता है।

क्या अदालतों में कैमरा होना चाहिए?
जिन लोगों ने अदालतों में कैमरा होने का पक्ष लिया है, उनमें मीडिया के वकील हैं। इसमें प्रिंट, रेडियो और खासतौर पर टीवी मीडिया है। इसके पक्ष में कुछ सरकारी अधिकारी और कानून के प्रोफेसर भी हैं। कैमरा लगाने के पक्षधर लोगों का कहना है कि इससे लोगों को अदालती कार्यवाही देखने को मिलेगी। इससे तमाम जनता का शिक्षण होगा कि किस तरह से न्यायिक तंत्र काम करता है। यह भी तर्क दिया गया कि जनहित के मामलों में लोग अदालत की कार्यवाही स्थानाभाव के कारण देख नहीं पाते हैं। ऐसे में केवल टीवी पर दी गई जानकारी पर निर्भर रहना होता है। यह भी तर्क दिया गया कि कैमरा इसलिए भी अदालतों में होना चाहिए, क्योंकि इससे न्यायाधीशों और वकीलों का बर्ताव और जिम्मेदारी भरा होगा। कुछ लोगों का तर्क है कि कार्यपालिका और विधायिका की तरह न्यायपालिका भी लोकतंत्र में शासन प्रणाली का एक अंग है और वहां भी कैमरे होना चाहिए। जिस तरह से संसद में सांसद को अपनी बात रखते हुए दिखाया जाता है, उसी प्रकार से न्यायपालिका में न्यायाधीशों को टीवी पर प्रसारण की अनुमति देना चाहिए।

जहां तक इस तरह के तर्क हैं तो न्यायाधीश पहले से ही जवाबदेह रहते हैं। यदि फैसले की बात करें तो उसके खिलाफ अपील की जा सकती है। उसकी समीक्षा हो सकती है। जो गवाह हैं उनके बर्ताव में जरूर बदलाव हो सकता है। गवाह बाहर की दुनिया में अपनी पहचान जाहिर न करना चाहते हो। गवाहों को अपनी सुरक्षा की चिंता हो सकती है। न्यायाधीशों को भी इस बात की हिचक हो सकती है कि वकीलों के साथ उनकी चर्चा किस तरह से टीवी पर पेश हो जाएगी।

दुनिया के अधिकतर देशों में अदालतों में कैमरे की अनुमति नहीं दी गई है। इंग्लैंड, वेल्स में अदालतों की कार्यवाही का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कवरेज प्रतिबंधित किया हुआ है। स्कॉटलैंड में इंग्लैंड की तरह सख्ती नहीं है। यहां पर पायलट प्रोग्राम की अनुमति कुछ रोक के साथ दी जा चुकी है। कनाडा में ज्यूडिशियल काउंसिल ने अदालतों में कैमरे का विरोध किया है। फिर भी कदाचित मामलों में कैमरे का प्रयोग किया गया है।

अदालतों में कैमरा लगाने का चलन कई देशों में है। परंतु फिर भी इस मामले में सावधानी से आगे बढ़ना ही ठीक है। किसी भी तरह के नीतिगत बदलाव के पहले सामाजिक स्तर पर इसकी स्वीकृति को परखना जरूरी है। जिला अदालतों में पायलट प्रोग्राम के तहत कैमरे लगाकर उसका अध्ययन करना एक अहम कदम होगा। एक बार अदालतों में कैमरे का प्रवेश हो गया तो फिर इन्हें हटाना मुश्किल होगा। यदि यह उचित नहीं हुआ तो इससे होने वाला नुकसान संभालना कठिन होगा। यह सही है कि इससे अदालतों के कामों को लोग आसानी से देख सकेंगे। इसे किस तरह से अपनाया जाएगा यह न्यायाधीशों के समक्ष चुनौती है।
फैक्ट- ब्राजील में कैमरे की अनुमति न केवल छोटी अदालतों वरन सुप्रीम कोर्ट में भी है। इतना ही नहीं, वहां पर चीफ जस्टिस के कमरे तक में कैमरा लगा हुआ है।
डॉ. मनोज कुमार
संस्थापक हम्मूराबी एंड सोलोमन लॉ फर्म,
सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट
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