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भक्ति से राबिया बनी महान संत

9 वर्ष पहले
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राबिया आला दर्जे की संत थीं। एक बार राबिया ने रोजा रखा। सात दिन तक उन्होंने कुछ भी नहीं खाया। सभी उनके ऐसे कठोर उपवास को देखकर दंग थे और चिंतित भी थे कि उन्हें कुछ हो न जाए, किंतु राबिया अपने प्रण पर दृढ़ रहीं।
आठवें दिन उन्होंने रोजा खोलने का निश्चय किया। किसी ने उनका निश्चय जान एक प्याले में फलों का रस रख दिया। राबिया जब वह रस ग्रहण करने उठीं, तो कहीं से एक बिल्ली आ गई और उसने प्याला उलट दिया। राबिया ने सोचा कि रस न सही, मैं पानी से रोजा खोल लेती हूं। वे मिट्टी के एक प्याले में पानी लाईं और चिराग जलाया।
जैसे ही उन्होंने प्याला होंठों से लगाया, चिराग बुझ गया और हाथ से प्याला गिरकर टूट गया। राबिया बहुत दुखी हुईं। वे कहने लगीं- ‘ओ परवरदिगार! तू क्या चाहता है? यह सब मेरे साथ क्यों कर रहा है?’ तभी राबिया को महसूस हुआ कि कोई उनसे कह रहा है - ‘राबिया! यदि तू चाहती है कि मैं दुनिया की नियामतें तुझे दूं, तो ठहर। पहले मैं अपना गम तेरे दिल से निकाल लूं। देख, तेरी एक मुराद है और मेरी भी एक मुराद है। ये दोनों मुरादें एक ही स्थान पर नहीं रह सकतीं।’
राबिया को बोध हो गया कि अल्लाह उनसे क्या चाहता है। उन्होंने उसी दिन से अपना दिल इस भौतिक संसार से हटा लिया और हर समय अल्लाह से यही मांगतीं- ‘ऐ खुदा! मेरे दिल को तू अपनी ओर ही लगाए रख, जिससे वह इस मायावी संसार की ओर आकर्षित न हो।’ इस प्रार्थना को पूरी ईमानदारी से अपने आचरण में जीकर राबिया महान संत बनीं। सार यह है कि दुनियावी आकर्षणों से परे रहकर आस्था और निष्ठा का एक ही केंद्र होने पर ही परमात्मा से एकाकार होने की दिव्य अनुभूति प्राप्त होती है।