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पैराडाइज पेपर्स में छिपे हुए खजाने का रहस्य

पत्रकारों ने मिलकर अमीर और ताकतवर लोगों के गुप्त निवेश के बारे में पैराडाइज पेपर्स के नाम से जो नया धमाका किया है।

Bhaskar Editorial | Last Modified - Nov 07, 2017, 05:23 AM IST

दुनिया भर के पत्रकारों ने मिलकर अमीर और ताकतवर लोगों के गुप्त निवेश के बारे में पैराडाइज पेपर्स के नाम से जो नया धमाका किया है, वह पनामा धमाके से एक कदम आगे है और इसमें व्यक्तियों से ज्यादा कॉर्पोरेट पर जोर होने से सरकारों को जांच पड़ताल करने और कार्रवाई करने में सुविधा होगी। बरमूडा की कंपनी एपलबाई और सिंगापुर की कंपनी एशिया सिटी से लीक हुए 1.34 करोड़ दस्तावेजों के माध्यम से दुनिया के आर्थिक ताने-बाने की जो कहानी प्रस्तुत हुई है वह रोचक और रहस्यमयी है भले ही उसमें सब कुछ गैर-कानूनी और कालेधन से संबंधित न हो। इस रिपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि किस तरह से कंपनियां नियामक संस्थाओं से नज़र बचाकर अपनी पूंजी को दूसरे देशों में कर्ज लेने के लिए इस्तेमाल करती हैं या उन्हें बेच देती हैं। दस्तावेज बताते हैं कि विजय माल्या ने कैसे यूनाइटेड स्प्रिट्स लिमिटेड इंडिया को 2012 में डियाजियो समूह को बेच दिया और इस तरह उन्होंने अपना धन उन जगहों पर भेजा जहां पर कर से छूट है। इस खुलासे में दुनिया के सबसे ज्यादा भारत के 714 लोगों के नाम हैं। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ से लेकर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी लोगों के भी नाम हैं लेकिन, असली सवाल यह देखना है कि इन कानूनी फर्मों के माध्यम से हुए पूंजी, कर्ज और कर के हस्तांतरण और हेराफेरी में कितना गैर-कानूनी है और कितना कानूनी? भारत ने दोहरे कराधान को रोकने के लिए कई ऐसे देशों से समझौता कर रखा है जहां पर कर की दरें कम हैं। इसलिए वहां की कंपनियां अपने प्रमाण-पत्र दिखाकर यहां कर से बच जाती हैं। दूसरी तरफ कर से पूरी तरह बचने को रोकने के लिए गार जैसा कानून भी है जिसे 2012 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की असफल कोशिश के बाद 2017 में कानूनी रूप दिया जा सका। इसके बावजूद इन कानूनों का कितना पालन ईमानदारी और पारदर्शिता के हित में हो रहा है और कितना निहित स्वार्थ के, इसकी तहकीकात और उस पर कार्रवाई की चुनौती सभी सरकारों के समक्ष उपस्थित है। संयोग से भारत में काला धन विरोधी दिवस के ठीक पहले आई यह रिपोर्ट हमारी सरकार के समक्ष चुनौती पेश करती है और पूरी दुनिया की सरकारों के समक्ष विचार के मुद्‌दे खड़े करती है।
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