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उद्यमशीलता दिखाकर कारगर हल खोजने होंगे

सस्ते विकल्प देने की हमारी क्षमता और उदारीकरण के फायदे गरीबों तक पहुंचाने की जरूरत।

Dainik Bhaskar

Nov 30, 2017, 05:32 AM IST
shashi tharoor column on Entrepreneurship

हैदराबाद के आंत्रप्रेन्योरशिप पर वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारतीय आंत्रप्रेन्योर से इवांका ट्रम्प जैसी शख्सियतों की चर्चा ने काफी उत्सुकता जगाई है। यह आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब भारतीयों ने आंत्रप्रेन्योरशिप को उत्साह के साथ गले लगाया है। भारतीय उद्यमशीलता की परम्परा नई नहीं है। भारतीयों ने सिर्फ सिलकॉन वैली में बल्कि लंदन, हॉन्गकॉन्ग और पूर्वी अफ्रीका के कई हिस्सों में स्टार्टअप्स के जरिये इसे सिद्ध किया है।


देश में स्टार्टअप के प्रसार का परिणाम है कि भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन गया है। उम्मीद है कि 2016 में 4700 स्टार्टअप से बढ़कर 2020 तक इनकी संख्या 11 हजार तक पहुंच जाएगी। 1991 के उदारीकरण के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था ने भी खुद में नाटकीय बदलाव लाया है, जब डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था कि धरती पर कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो उस विचार को रोक सके, जिसका वक्त चुका है। यह विचार था भारतीय अर्थव्यवस्था को खोलने का। इसके कारण हम 2008 के अार्थिक संकट के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में मची उथलपुथल का सामना कर सके। इसने हमें क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया।


चूंकि औसत आयु हमारे पक्ष में है तो सर्वश्रेष्ठ तो अभी आना है। यूरोप में 2020 तक औसत आयु 46, जापान में 47 और यहां तक कि युवा आप्रवासियों से संचालित अमेरिका में भी यह 40 वर्ष होगी लेकिन, भारत में तब औसत आयु 29 होगी। आधी आबादी तो 25 के नीचे और करीब 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष के नीचे होगी और स्कूल से आने वाले युवा ऊर्जावान, प्रतिस्पर्धी, उत्पादक वर्कफोर्स में शामिल होंगे। भारत दुनिया का अगला इंजन हो सकता है।


लेकिन यह आबादीगत फायदा केवल तभी हमारे पक्ष में काम करेगा, जब हम युवाओं को 21वीं सदी में उपलब्ध अवसरों का लाभ लेने लायक शिक्षित-प्रशिक्षित करेंगे। वे अवसर जो आंत्रप्रेन्योर निर्मित कर रहे हैं। यदि हम अशिक्षित (या कम शिक्षित), बेरोजगार (और व्यापक रूप से रोजगार लायक नहीं) और इसलिए अत्यधिक कुंठित युवा महिला-पुरुष पैदा करते रहे तो आबादीगत लाभ हमारे लिए विनाश भी साबित हो सकता है। भारत की क्षमता का दोहन करने तथा उम्मीद के मुताबिक सामाजिक आर्थिक बदलाव लाने के लिए हमें अत्यधिक शिक्षित और प्रेरित आंत्रप्रेन्योर चाहिए।


कुछ सफल होंगे और कुछ संख्या में विफल भी होंगे लेकिन, वे सब हमारे अार्थिक क्षेत्रों में ऊर्जा भर देंगे और आंत्रप्रेन्योर संबंधी प्रयास का वातावरण विकसित करने में मदद करेंगे। हमारी ‘जुगाड़’ की भारतीय पद्धति ने अलग हटकर सोचने, परिचित चीजों को नए उद्देश्य से इस्तेमाल कर सीमित संसाधनों में ही समाधान तलाशने के तरीके के रूप में काफी ध्यान खींचा है। हालांकि, आलोचक कहते हैं, जहां यह भारतीय कल्पनाशीलता दिखाती है वहीं आमतौर पर इसमें श्रेष्ठता निर्मित करने की बजाय काम निकालने का उद्देश्य होता है। लेकिन, जुगाड़ की भावना इससे काफी आगे जाती है। ‘फ्रुगल इनोवेशन’ को गूगल सर्च करें और पहले 20 भारतीय इनोवेशन से ही जुड़े होंगे। वहां हाथ में थामे जाने वाला इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) डिवाइस है, जो 50 हजार रुपए का है (सबसे सस्ता विकल्प एक लाख रुपए से ज्यादा का है)। इससे कार्डियोग्राम की लागत 50 रुपए रह गई है। डेढ़ हजार रुपए का टाटा स्वच्छ एयर प्यूरीफायर है (अपने निकटतम प्रतिस्पर्धी से 10 गुना सस्ता)। भारतीय बायोटेक कंपनियों ने इंसुलिन इंजेक्शन और हेपेटाइटिस-बी वैक्सीन की कीमत एकदम कम कर दी है। वैक्सीन की कीमत तो 15 डॉलर (960 रुपए) से घटकर 10 सेंट (साढ़े छह रुपए) रह गई है)।


भारतीय उद्यमशीलता की मौलिकता ने चकित करने वाली संख्या में दुनिया को मात देने वाले इनोवेशन दिए हैं। टाटा नैनो से ज्यादा प्रभावशाली तो कुछ भी नहीं, जिसकी कीमत पश्चिम की किसी लग्ज़री कार में लगने वाले हाईएंड डीवीडी प्लेयर जितनी है। एल्यूमिनियम इंजन का अाविष्कार करके स्टील का इस्तेमाल घटाने, पहियों को चेसिस के किनारे तक ले जाकर जगह बढ़ाना, मॉड्यूलर डिजाइन ताकि कार को किट से भी असेंबल किया जा सके। इन सबने यह पक्का किया कि कम लागत में भी अधिकतम संभव सुविधा दी जा सकती है।


इसी प्रकार मंगलयान मिशन में हमें करीब 492 करोड़ रुपए लगे, जो हॉलीवुड स्पेस मूवी ग्रेविटी के बजट से कम थे और नासा के खुद के मंगल कार्यक्रम की 4,500 करोड़ रुपए की लागत का सिर्फ 11 फीसदी। लीक से हटकर सोचना सीमित संसाधनों के भीतर इनोवेटिव समाधान, ऐसी बातें हैं जो हम करने लगे हैं। हमारे देश ने ही हजारों साल पहले शून्य का आविष्कार किया था। लेकिन, आज हम जो भी आविष्कार करते हैं वह कभी-कभी शून्य लगता है। उद्यमशीलता कुंजी है। मुझे महान उद्योगपति जमशेदजी टाटा की वह कहानी बहुत प्रेरित करती है कि 1890 में उन्हेंं बॉम्बे की पाइकस् होटल में जाने नहीं दिया गया, जहां बोर्ड लगा था, ‘भारतीयों कुत्तों को प्रवेश नहीं।’ इसलिए उन्होंने कहीं अधिक भव्य होटल बनाया, जो भारतीयों के लिए खुला था- ताजमहल पैलेस होटल, जिसे आज दुनिया के शानदार होटलों में शुमार किया जाता है, जबकि पाइकस् कब का बंद हो चुका है।


जब उन्हीं टाटा ने 1905 में भारत का पहला स्टील का कारखाना स्थापित किया तो एक ब्रिटिश अधिकारी ने तिरस्कार करते हुए कहा कि यदि कोई भारतीय स्टील पैदा कर दे तो वह खुद आकर इसका एक-एक आउंस खा जाएगा। खेद है कि वह इतना लंबा नहीं जिया कि जमशेदजी टाटा के उत्तराधिकारियों को कोरस के रूप में ब्रिटिश स्टील के शेष हिस्से का अधिग्रहण करते देखता। कहने का आशय यह कि भारतीय यह कर सकते हैं। लेकिन, जहां उद्यमी फलते-फूलते हैं वह बाजार उन्हें आकर्षित नहीं कर सकता, जहां जाना उनके बस की बात हो। हमें वैश्वीकरण और उदारीकरण के फायदे गरीबों को देने होंगे। हम 9 फीसदी से वृद्ध करंे या अभी की तरह 5.7 फीसदी की दर से करें, हमारे विकास का फोकस हमेशा हमारी आबादी के सबसे निचले 25 फीसदी तबके पर होना चाहिए। हमारी समस्याएं वे ही हैं, जैसी हमेशा रही हैं। चुनौती यही है कि हम उद्यमशीलता दिखाकर पुराने प्रश्नों के नए उत्तर खोजें। (येलेखक के अपने विचार हैं।)

शशि थरूर

विदेशमामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री
Twitter@ShashiTharoo

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