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सुभाषचंद्र की परोपकार भावना

7 वर्ष पहले
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तब नेताजी सुभाषचंद्र बोस छात्र थे। उनकी मां पढऩे में होशियार अपने बेटे का बहुत ध्यान रखती थीं। एक दिन वे दूध लेकर बेटे के अध्ययन कक्ष में आईं तो पाया कि सुभाष कमरे में नहीं है। मां को अचरज हुआ कि एकाएक लड़का कहां चला गया? तभी उन्होंने देखा कि सुभाष की मेज से उसकी पुस्तकों की अलमारी की ओर चींटियों की एक लंबी कतार जा रही है। मां हैरान हुई कि इतने साफ-सुथरे कमरे में चींटियां क्यों आईं? अलमारी खोली तो पुस्तकों के पीछे दो मीठी रोटियां रखी थीं।

चींटियां रोटियों को तोड़-तोड़कर ले जा रही थीं। उन्होंने रोटियां हटाकर अलमारी ठीक की। तभी सुभाष का कमरे में आगमन हुआ। उन्होंने उदास स्वर में पूछा, 'यहां क्या कर रही हो, मां?' मां ने गुस्से में कहा, 'तेरा दिमाग खराब हो गया है। तूने अलमारी में मीठी रोटियां क्यों रखीं? वहां चींटियां हो गई हैं।' सुभाष ने डबडबाई आंखों और भरे गले से पूछा, 'तुमने वे रोटियां फेंक दीं मां? ठीक ही किया।' मां सुभाष की दशा पर विचलित हो गईं और पूछा, 'क्या हुआ सुभाष?'

तब सुभाष ने बताया, 'मैं रोज अपने भोजन से दो रोटियां बचाकर एक वृद्ध भिखारिन को देता था। वह मेरे विद्यालय के रास्ते में खड़ी होती थी। कल वह मुझे नहीं मिली तो मैंने उसके हिस्से की रोटियां यहां रख दीं। सोचा था कि फिर किसी समय दे दूंगा। किंतु मुझे अभी पता चला कि उसकी मृत्यु हो गई। मां! हमें गरीबों की सहायता करनी चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है और ऐसा कर हम कोई अहसान नहीं करते।' मां, सुभाष का उच्च परोपकार भाव देख गदगद हो गईं। निर्धनों की सहायता का जज़्बा यदि सामाजिक आंदोलन की शक्ल ले ले तो गरीबी से काफी हद तक मुक्ति पाई जा सकती है।