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अगले पोप पर टिकी चर्च की उम्मीदें

9 वर्ष पहले
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इस महीने के अंत में रोमन कैथोलिक चर्च के मुखिया पद से पोप बेनेडिक्ट 16 की विदाई के बाद उनकी जगह कौन लेगा, इसके बारे में कयासों का दौर शुरू हो चुका है। बीबीसी, सीएनएन से लेकर सट्टेबाज तक इन कयासों को हवा देने में आगे हैं।
मीडिया बार-बार यह सवाल पूछ रहा है कि नया मुखिया लैटिन अमेरिका का होगा या अफ्रीका का, क्योंकि इन्ही इलाकों में चर्च का प्रभाव कम होने के बजाय बढ़ रहा है। या फिर बौद्धिक स्वभाव के बेनेडिक्ट के बाद कोई अमेरिकी, जो आम लोगों का पोप हो अथवा कोई ऐसा शख्स, जो पुरातनपंथी विचारधाराओं से प्रभावित होने के बजाय आधुनिक जीवन की वास्तविकताओं से भलीभांति परिचित हो- इन विकल्पों पर पुरजोर चर्चा चल रही है।
सट्टेबाज पैडी पावर मिलान के कार्डिनल एंजेलो स्कोला को सबसे आगे बता रहा है। सट्टा बाजार में उनके पक्ष में 11/4 का दांव चल रहा है, 7/2 के दांव के साथ घाना के पीटर तुर्कसन दूसरे नंबर पर हैं, जबकि कनाडा के कार्डिनल मार्क उइलेट 9/2 के साथ तीसरे नंबर पर हैं।
परदे के पीछे राजनीतिक तिकड़म भी खूब चल रही है। वैसे 80 वर्ष से कम आयु के 118 कार्डिनल, जो नए पोप का चुनाव करेंगे, इन चर्चाओं को गंभीरता से नहीं लेते। इनमें आधे से ज्यादा यूरोप के हैं। हालांकि, पूरी दुनिया में 1.3 अरब कैथोलिक धर्मावलंबियों में यूरोप के लोगों की तादाद 25 प्रतिशत ही रह गई है। सबसे ज्यादा 28 वोट इटली के पास हैं और वे किसी इटालियन को इस पद पर बिठाने की जुगत में लगे हैं। 11 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर अमेरिका है।
इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि मतदाता मंडल को देखकर किसी व्यापक बदलाव की संभावना कम ही है। पिछली कई सदियों में पोप के पद पर पहुंचने वालों में बेनेडिक्ट सबसे बुद्धिमान हैं। वे मौजूदा दौर के सर्वश्रेष्ठ धर्मज्ञानी तथा दार्शनिकों में शामिल हैं। तीन खंडों में लिखी ईसा मसीह की जीवनी से उन्होंने अपनी लेखनी का लोहा मनवाया है।
उनका व्यक्तित्व भी आकर्षक है। लेकिन पोप के पद पर रहते हुए वे अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे थे। वे चर्च को ऐसी हालत में छोड़कर जाएंगे, जो तमाम खामियों और चोटों का शिकार है। उसका पटरी पर लौटना इतना आसान नहीं होगा। केवल इसलिए नहीं कि नए पोप का चुनाव करने वाले सारे कार्डिनल खुद उनके या उनके पूर्ववर्ती जॉन पॉल 2 द्वारा नियुक्त किए गए हैं, बल्कि इसलिए भी कि इनमें से अधिकांश बेनेडिक्ट के सांचे में ही ढले हैं। वे सैद्धांतिक मामलों में तो निष्णात हैं, लेकिन गर्भ निरोध, गर्भपात, समलैंगिक विवाह, विवाहित पादरियों और महिला पादरियों जैसे विषयों के पूरी तरह खिलाफ हैं।
सालों पहले बेनेडिक्ट के खुशमिजाज लेकिन सख्त व्यक्तित्व का अनुभव मुझे मिल चुका है। तब मैं इंग्लैंड के कैथोलिक अखबार द यूनिवर्स का संपादक था, जिसकी रोजाना 120,000 प्रतियां बिकती थीं। उस समय कार्डिनल जोसेफ रेटजिंगर बेनेडिक्ट थे। वे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी आए थे। मैंने उनसे इंटरव्यू न सही, लेकिन बातचीत करने का एक मौका मांगा। उन्होंने इससे इंकार कर दिया, लेकिन उन्होंने मुझे उनकी तस्वीर लेने की इजाजत दे दी। वे किसी गंभीर बातचीत से मना करते रहे।
78 वर्ष की उम्र में पोप चुने गए बेनेडिक्ट को कई टिप्पणीकार अस्थायी मानते थे। लेकिन वे विचारधारात्मक पवित्रता के प्रति अपने जुनून को लेकर आगे बढ़ते रहे। उनकी विचारधारा में जीवन के आधुनिक रीति-रिवाजों के लिए कोई जगह नहीं थी और वे इसमें किसी छूट के लिए कभी तैयार नहीं हुए।
पश्चिमी देशों में उम्रदराज होते पादरियों की समस्या से निबटने के लिए विवाहित या महिला पादरियों के विकल्प पर चर्च द्वारा विचार की मांग का साहस करने वाले पादरियों और बिशपों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अमेरिकी नन जिन्होंने शिक्षा तथा समाज के पिछड़े तबके के लोगों की मदद के क्षेत्र में महती भूमिका निभाई थी, की जांच-पड़ताल की गई।
ढंग से कपड़े न पहनने तथा वेटिकन के संकीर्ण विचारों के विपरीत जाकर चर्च में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने की मांग करने के लिए उनकी खिंचाई की गई। इस बीच अपराध करने और बाल शोषण के दोषी पथभ्रष्ट कैथोलिक पादरियों को दंड से सालों तक बचाया गया। जब चर्च के लिए यह मामला बड़ा स्कैंडल बन गया तो पोप बेनेडिक्ट सामने आए और जोरदार तरीके से इस पर दुख जताते हुए पीड़ितों के प्रति संवेदना जताई और माफी भी मांगी।
मुस्लिम समुदाय के साथ संबंधों के मामले में एक गंभीर गलती उनसे तब हो गई, जब उन्होंने चौदहवीं सदी के एक ईसाई राजा का बयान दोहराते हुए कह दिया कि हर गलत और अमानवीय चीजों के लिए इस्लाम ही जिम्मेदार है। गुड फ्राइडे प्रार्थनाओं में संशोधन की बात कहकर उन्होंने यहूदियों की भावनाओं को भी आहत कर दिया। कई कैथोलिक बिशपों और परंपरावादी अनुयायियों के लिए बेनेडिक्ट विश्वास खो चुकी दुनिया में निश्चितता के अकेले प्रकाश स्तंभ थे। लेकिन रोजाना की समस्याओं से परेशान लाखों आम कैथोलिक और करोड़ों गैर-कैथोलिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बेनेडिक्ट के पास कहने को कुछ नहीं था। मिलान के पूर्व आर्कबिशप कालरे मारिया मार्टिनी ने पिछले साल अपनी मृत्यु से ठीक पहले एक इंटरव्यू में चर्च की जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा कि इतिहास, नौकरशाही परंपरा और रीति-रिवाजों की राख के बोझ तले दबा हुआ चर्च समय से 200 साल पीछे चल रहा है।
रोमन कैथोलिकों का विश्वास है कि बेनेडिक्ट के उत्तराधिकारी के चुनाव के लिए आयोजित गुप्त सभा में मतदान के दौरान पवित्र आत्मा बिशपों का दिशा-निर्देशन करेगी। इस आत्मा को उन्हें प्रेरित करने के सर्वश्रेष्ठ प्रयास करने होंगे, तभी वे राजनीतिक तिकड़मबाजियों से ऊपर उठकर ऐसे आदमी का चुनाव कर सकेंगे, जिसके पास विश्वास और उम्मीद है और जो इतना शक्तिशाली है कि जख्मी हो चुके चर्च की सुरक्षा कर सके।
केविन रैफर्टी
प्लेनवर्डस मीडिया के एडिटर इन चीफ