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अराजकता के शोर में मूल मुद्दा गायब

7 वर्ष पहले
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'आप' बनाम अन्य के बीच आरोप-प्रत्यारोपों के शोर में पुलिस को जवाबदेह बनाने का असली मुद्दा कहीं गुम हो गया, जबकि इस मुद्दे को उठाने का यह अच्छा अवसर था। दरअसल हमारी मुख्य धारा की राजनीति को मुख्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कला खूब आती है।

अब इस पर कोई चर्चा नहीं है कि पुलिस के बेलगाम हिस्से के हाथों आम लोगों के लगातार पीडि़त होते रहने की समस्या से यह देश कैसेे व कब निजात पाएगा। अरविंद केजरीवाल और उनके विधि मंत्री के अराजक व्यवहार की चर्चा जरूर हो रही है। होनी भी चाहिए। यह सही है कि यदि उन्होंने कोई अन्य शालीन तरीके अपनाए होते तो बेहतर होता।
पर सवाल यह भी है कि यदि मुख्यमंत्री ने धरना नहीं दिया होता तो क्या उन दो पुलिस अफसरों को छुट्टी पर भेजा जाता? यानी दो मामूली पुलिस अफसरों को सिर्फ छुट्टी पर भेजने के लिए भी मुख्यमंत्री को धरना देना पड़ता है। सत्ताधारियों द्वारा आखिर कितनी ताकतवर और निरंकुश बना दी गई है हमारी पुलिस?
आश्चर्य नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद किसी राज्य ने पुलिस सुधार लागू नहीं किए। देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2006 में ही पुलिस को स्वायत्तता देने के लिए सात सूत्री उपाय करने का निर्देश केंद्र व राज्यों को दिया था। दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो विभिन्न सरकारें आमतौर पर पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए करती हैं।
'आप' के दिल्ली धरने के समय भी यह सवाल उठा था कि क्यों किसी केंद्रीय मंत्री के आवास पर मात्र पत्थर फेंके जाने के बाद तो पुलिस अफसर को सजा दे दी जाती है पर दिल्ली सरकार के मंत्रियों के कहने पर भी संदिग्धों व अपराधियों के छिपे स्थानों पर पुलिस छापे तक नहीं मारती? पुलिस ऐसी लापरवाही इस बात के बावजूद कर रही है कि दिल्ली में अपराध का ग्राफ इन दिनों तेजी से बढ़ता जा रहा है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में दिल्ली में अपराध की कुल 51 हजार 479 घटनाएं हुई थीं जबकि 2013 में यह संख्या बढ़कर 73,958 हो गई। इसी अवधि में दुराचार की घटनाओं की संख्या 680 से बढ़कर 1559 हो गई। लगभग पूरे देश में अपराध व पुलिस की कार्यशैली का कमोबेश यही हाल है। पर दिल्ली पुलिस बनाम केजरीवाल विवाद को लेकर प्रभुत्व वर्ग के एक बड़े हिस्से के साथ बड़े-बड़े रिटायर्ड व मौजूदा पुलिस अफसरों ने जिस तरह ट्रेड यूनियन मानसिकता के साथ केजरीवाल की आलोचना की है, उससे देश की खासतौर पर पुलिस प्रशासन की चिंताजनक स्थिति ही सामने आती है।

केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद आलीशान दफ्तर में बैठकर शांतिपूर्वक राजपाट चला सकते थे। वे कह सकते थे कि अपराध होता है तो होने दो, मैं क्या करूं, दिल्ली पुलिस पर हमारा कोई कंट्रोल तो है नहीं। पर अपने 'अराजक' तरीके से ही सही, केजरीवाल ने बेलगाम व गैर जिम्मेदार पुलिस व्यवस्था व उनके संरक्षकों की असली तस्वीर देश के सामने रख दी है।

लेखक दैनिक भास्कर, पटना के एडिटोरियल एडवाइजर हैं।

surendarkishore@gmail.com