महान व्यक्तियों के सान्निध्य का जब भी अवसर मिले, वहां से खाली हाथ न लौटें और बिना उद्देश्य वहां जाएं भी नहीं। जो उन्होंने पाया है, उस जीवन के सत्य को टटोलने का प्रयास करें। अपनी कमजोरियों की पूरी जानकारी रखें और उनकी श्रेष्ठताओं से परिचित हो जाएं। श्रेष्ठों से मिलने का यह विधान है। सुंदरकांड में तुलसीदासजी विभीषण और श्रीराम को पहली बार मिलवा रहे हैं। इस अवसर पर लिखा गया है-नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचिर बंस जनम सुरत्राता।। सहज पापप्रिय तामस देहा।
जथा उलूकहि तम पर नेहा।। हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूं। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षसकुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है। मैं आपका सुयश सुनकर आया हूं कि प्रभु भव (जन्म-मरण) के भय का नाश करने वाले हैं। हे दुखियों के दुख दूर करने वाले श्रीरघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए। पहले तो विभीषण ने अपनी कमजोरी बताई। इस जानकारी के बिना हम अपनी कमी की भरपाई कैसे कर पाएंगे। विभीषण ने श्री राम की दो विशेषताओं को व्यक्त किया है। ‘‘आरति हरन’’ दुख दूर करते हैं और ‘‘सरन सुखद’’ सुख देने वाले हैं। इन्हीं दो बातों को यश कहा है। हम दूसरों के दुख दूर करें और उन्हें सुख भी दें, इसी मंे हमारा यश है। विभीषण समझते थे कि श्रीराम जैसे महान व्यक्ति से क्या लिया जा सकता है, लंका में रहने का दुख यहां आकर मिटेगा। श्रीराम के सान्निध्य से बड़ा सुख और क्या हो सकता है।