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नैतिक उलझनों और संदेहों का दौर

9 वर्ष पहले
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मैं निश्चितताओं के दौर में पला-बढ़ा हूं। हमें स्पष्ट पता होता था कि गलत क्या है और सही क्या। जब कभी हम सत्ता की अवज्ञा कर कुछ गलत भी करते, हमें यही लगता कि हम सही हैं। अच्छा या बुरा, नैतिकया अनैतिक को लेकर हमारे दिमाग में कोई उलझन या संदेह नहीं था।
अधिकांश जरूरी चीजों के बारे में सब कुछ स्पष्ट था। यही हमारी पीढ़ी की खासियत और हमारी पहचान भी थी। हमें पता था कि हमारा वजूद क्या है। गुजरते सालों के साथ यह निश्चितता भी कम हो गई है। आजकल हम नैतिक दुविधा के दौर में जी रहे हैं। हर चीज के बारे में एक मनमोहक अस्पष्टता का अहसास होता है और यह अस्पष्टता ही हमारे नैतिक पसोपेश की झलक दिखाती है।
हम सभी युद्धभूमि में खड़े अजरुन जैसे हैं, थोड़े-से अनिश्चित, थोड़ी-बहुत शंकाओं से घिरे हुए, उस निश्चितता की तलाश में, जो हमसे दूर भागती है। आस्था भी हमें यह भरोसा उतनी आसानी से नहीं दे सकती, जैसे पहले देती थी।
आधुनिकता केप्रहारों से परंपराएं तार-तार होकर रह गई हैं। नैतिक दिशासूचक जो पहले हमें सही दिशा बताता था, बेकार हो चुका है। सामने केवल उजड़ा हुआ बियाबान है, जहां हमारे नायक अब नायक नहीं रहे और खलनायक होना ज्यादा सम्मोहकहै। ऐसे दौर में गलत और सही के बीच फर्क करना कैसे आसान हो सकता है?
यह अस्पष्टता हमारे सार्वजनिकजीवन में भी प्रवेश कर चुकी है। यदि किसी को मौत की सजा हुई हो तो क्या हम उसे फांसी पर लटकाते हैं? यदि हम ऐसा करते हैं तो दुनिया से अलग नजर आने लगते हैं। तकरीबन हर जगह राज्य द्वारा मौत की सजा खत्म हो चुकी है। यदि हम महात्मा गांधी की कही बात को मान लें और यह कहें कि आंख के बदले आंख से तो पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी, तो फिर उनका क्या होगा, जो पीड़ितों की मौत पर आंसू बहाते हैं? उनके आंसू कैसे रुकेंगे? यह आतंकी वारदातों के मामलों में खास तौर से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन वारदातों में मौत और जख्मों से इतनी जिंदगियां तबाह होती हैं कि आंसू खत्म नहीं होते और लोग इसे भूलकर आगे बढ़ने में कामयाब नहीं होते। वैसे भी माफ करना इतना आसान काम नहीं होता।
यही अस्पष्टता उस समय भी नजर आती है जब हमें विकास और पर्यावरण सुरक्षा के बीच किसी एक विकल्प का चुनाव करना होता है। यहां समस्या दोहरी है क्योंकि पर्यावरण की सुरक्षा का मतलब जंगल, पहाड़, नदी और लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है। इसका तात्पर्य जीविकोपार्जन के साधन, गुम हुई संस्कृतियों, भाषाओं और सबसे बढ़कर उन लाखों लोगों का स्वास्थ्य और भलाई सुनिश्चित करने से भी है, जो गरीब और कमजोर हैं और जो समृद्धि के सब्जबाग दिखाने वाले राजनीतिक पहुंच वाले परभक्षियों से खुद अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते।
विकास की मजबूरी इस समस्या को और गंभीर बना देती है, क्योंकि सरकार भी जीवन की गुणवत्ता को सुरक्षित रखने से ज्यादा भरोसा आंकड़ों पर करती है। भारत आज खुद का ही प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है और उसे अपने लक्ष्यों के बारे में ही स्पष्ट पता नहीं है। वह यह फैसला नहीं कर पा रहा कि उसे विकास के वैश्विक मापदंडों पर आगे बढ़ना चाहिए या फिर अपनी परंपराओं को सहेजकर रखना चाहिए। हम प्रवासियों का देश बनते जा रहे हैं, जो अपने सपनों के पीछे भाग रहे हैं, भविष्य के सुनहरे सपने देख रहे हैं। इस प्रक्रिया में हम अपने बीते हुए कल को भूलते जा रहे हैं और भविष्य को बंधक बनाते जा रहे हैं।
लेकिन हमारी सबसे गंभीर शंकाएं नैतिकता से जुड़ी हैं। यदि बख्शीश अच्छी है तो फिर रिश्वत खराब कैसे है? यदि रिश्वत देना खराब है तो फिर दलालों और बिचौलियों का होना कानून-सम्मत कैसे हो सकता है? यदि आप मकान तलाशने के लिए किसी दलाल की मदद ले सकते हैं तो फिर एयरक्राफ्ट या होवित्जर की खरीदारी के लिए बिचौलिये की मदद लेने में गलत क्या है? यदि सरकार रेलवे के तत्काल टिकट और टेलीफोन के लिए आपसे ज्यादा पैसा ले सकती है तो फिर किसी फाइल को जल्दी आगे बढ़ाने या जल्दी परमिट हासिल करने के लिए पैसे देने में क्या बुराई है? यदि फर्जी एनकाउंटर वैध हैं और सरकार अपराधियों को बिना अदालती फैसले के मौत दे सकती है तो ऑनर किलिंग में क्या खराबी है? क्या पंचायत भी सरकारी तंत्र का एक हिस्सा नहीं है? यदि सरकार अयोग्य छात्रों को ग्रेस मार्क्‍स देकर पास करा सकती है तो परीक्षक को ऐसा करने से क्यों रोकें? गलत और सही के बीच की विभाजकरेखा पहले ही काफी पतली है और इन सवालों का जवाब तलाशने में वह और भी धुंधली हो जाती है।
बॉलीवुड के कुछ सबसे यादगार गानों में नायिकाएं और खलनायिकाएं डांस बार में नाचती हुई दिखाई गई हैं, फिर मुंबई में डांस बार को प्रतिबंधित क्यों किया जा रहा है? बच्चे भी इन गानों पर खूब डांस करते हैं। बाल श्रम को प्रतिबंधित करने के चलते कई परंपरागत शिल्प खत्म हो गए, क्योंकि बच्चे बचपन में अपने माता-पिता से इन्हें सीखते थे। यह फैसला करना कठिन होता जा रहा है कि सही क्या है। और हमारे कानून इसे और मुश्किल बना रहे हैं।
रविवार के अखबार में घाटकोपर की गंदी बस्तियों की एक खबर छपी थी, जिसमें चार महिलाओं ने एक युवक की इतनी पिटाई की कि उसकी मौत हो गई। उनका दावा था कि वह आदतन अपराधी था और इलाके की महिलाओं को परेशान करता था। हत्या के समय पूरी बस्ती के लोग मौजूद थे, लेकिन कोई गवाही देने के लिए तैयार नहीं है। वहीं युवक के परिवार वाले इन आरोपों से इंकार कर रहे हैं। मैं किस पर भरोसा करूं? मैं किन लोगों से सहानुभूति रखूं? हर जगह नैतिक शंकाएं मौजूद हैं। इससे हिंसा को बढ़ावा मिलता है- क्रूर और न रोकी जा सकने वाली हिंसा। कहीं यह भी आने वाले समय का संकेत तो नहीं है?
प्रीतीश नंदी
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार