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जनअसंतोष का इजहार

9 वर्ष पहले
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मजदूर संघों की अपील पर दो दिन की हड़ताल को जैसा व्यापक समर्थन मिला, उसमें सरकार के लिए गंभीर पैगाम छिपा है।
संदेश यह है कि जनमत का एक बड़ा हिस्सा राजकाज की स्थितियों से संतुष्ट नहीं है और सरकार जनता के इस हिस्से से भरोसेमंद संवाद कायम करने में विफल है। नतीजा यह है कि मौका मिलते ही उसका असंतोष सड़कों पर उमड़ आता है। हड़ताल आर्थिक मुद्दों पर आयोजित की गई। ट्रेड यूनियनों की कई मांगें अमूर्त थीं।
मसलन, महंगाई घटाने और रोजगार के अवसर पैदा करने की मांगें उचित भले ही हों, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए किसी व्यावहारिक कार्ययोजना का सुझाव देना कठिन है। इसके बावजूद श्रमिक वर्ग ने बढ़-चढ़कर हड़ताल में हिस्सा लिया।
यहां यह सवाल प्रासंगिक है कि अगर समय रहते सरकार ट्रेड यूनियनों से बातचीत करती तो क्या इस हड़ताल को टाला नहीं जा सकता था, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को तकरीबन बीस हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान है। हड़ताल के कारण कई राज्यों में हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं बड़े पैमाने पर हुईं। यूनियनों ने हड़ताल का नोटिस नौ महीने पहले दिया था। लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया। जब हड़ताल को चंद दिन रह गए, तो वह हरकत में आई।
लेकिन तब प्रधानमंत्री की अपील और मंत्रियों द्वारा की गई बातचीत को महज रस्म-अदायगी ही माना गया। दरअसल, जनता से संवाद करने में सरकार, बल्कि पूरे राजनीतिक समुदाय की कमजोरी हाल के समय में बार-बार जाहिर हुई है।
नतीजतन, जिस तरह बार-बार सड़कों पर लोगों का आक्रोश व्यक्त हो रहा है, वह देश के पूरे राजनीतिक समुदाय के लिए एक गंभीर चेतावनी है। 2011 में भ्रष्टाचार से उद्वेलित लोग सड़कों पर उतरे। पिछले साल बलात्कार के सवाल पर देशभर में स्वत:स्फूर्त प्रतिरोध भड़क उठा। अब आर्थिक मसलों पर लोगों ने अपना गुस्सा जताया है। हड़ताल की सफलता श्रमिक वर्ग में गहराती गई इसी धारणा का परिणाम है कि सरकार अर्थव्यवस्था को जिस दिशा में ले जा रही है, उसमें श्रमिकों के हितों की बलि चढ़ रही है। जिस समय आर्थिक विकास के मुद्दों पर देश के न सिर्फ राजनीतिक, बल्कि व्यापक सार्वजनिक दायरे में आम सहमति की जरूरत है, यह रुझान चिंताजनक है।