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अगला प्रधानमंत्री कैसा होगा?

8 वर्ष पहले
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अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह दावे से कौन कह सकता है, लेकिन सभी दलों के नेता जिस एक आदमी के पीछे हाथ धोकर पिल पड़े हैं, उसका नाम है- नरेंद्र मोदी। मोदी का बुखार सब पर सवार है। कोई कहता है मोदी तो 'राष्ट्रीय विपत्ति' सिद्ध होगा, कोई मानता है कि वह 'टुकड़े-टुकड़े कर देगा', कोई उसे भावी हिटलर बता रहा है और कोई कह रहा है कि बस, उसे एक बार सत्ता में आने दो, फिर देखना देश में दंगों के पटाखों की लडिय़ां फूटने लगेंगी। भविष्य की ये सब आशंकाएं कितनी खरी हैं, इन पर हम आगे विचार करेंगे, लेकिन उक्त कथनों का एक अर्थ तो स्पष्ट ही है। वह यह कि सभी मोदी-निंदक अभी से मान चुके हैं कि अगले प्रधानमंत्री तो नरेंद्र मोदी ही बनेंगे।

तो क्या भारत के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैसे ही होंगे, जैसा कि उनके विरोधी उन्हें चित्रित कर रहे हैं? यदि वैसा होगा तो यह भारत का बड़ा दुर्भाग्य होगा। तो कैसा होगा, हमारा अगला प्रधानमंत्री? मोदी ने जिस दिन गुजरात में तीसरी बार चुनाव जीता, उसी दिन मैंने 'भास्कर' (20 दिसंबर 2012) में लिखा था कि 'प्रधानमंत्री के द्वार पर मोदी की दस्तक' और फिर लिखा था कि मोदी के शरीर में जब तक अटलजी की आत्मा का प्रवेश नहीं होता, वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। यह बात तब कही गई थी, जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम दूर-दूर तक कहीं नहीं था। अब मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने तो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मान ही लिया है, विरोधी दल उन्हें भावी प्रधानमंत्री मानकर खुर्दबीन से उनके दोष टटोल रहे हैं।

मोदी-निंदकों का मानना है कि प्रधानमंत्री बनते ही मोदी सबसे पहले भाजपा के अपने साथी-नेताओं को कलम करेंगे, फिर संघ को मुड्डे पर बिठाएंगे और फिर विरोधियों की बोलती बंद करेंगे। इंदिरा गांधी ने सत्तारूढ़ होने के नौ साल बाद आपातकाल लगाया, मोदी यह काम नौ महीने में ही कर डालेंगे। मान लें कि मोदी यही करना चाहेंगे। तो क्या वे यह कर सकेंगे? यह ठीक है कि आज मोदी की लोकप्रियता 1971 की इंदिरा गांधी से कम नहीं है। कुछ ज्यादा ही मालूम पड़ती है, खासतौर से उनकी सभाओं में उमडऩे वाली भीड़ और उसके उत्साह को देखते हुए, लेकिन मोदी इंदिरा गांधी नहीं हैं और गुजरात, भारत नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के पहले इंदिराजी अखिल भारतीय स्तर की नेता बन चुकी थीं। वे कांग्रेस-अध्यक्ष रह चुकी थीं और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की बेटी और उनके घर की प्रथम महिला की तरह राजनीतिक अनुभव ले चुकी थीं।

इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज और खुर्राट नेताओं को पटखनी लगाई, अपने नाम से नई कांग्रेस खड़ी की और वे अपना ध्वज स्वयं बन गईं। मोदी तो सिर्फ मुख्यमंत्री रहे। शेर की तरह रहे, लेकिन गुजरात के पिंजरे में बंद! आज वे सारे देश में दहाड़ रहे हैं। इसका कारण वे स्वयं नहीं हैं। इंदिराजी अपना कारण स्वयं थीं। मोदी का कारण कौन है? मोदी आज जो हैं और अगले माह जो होने जा रहे हैं, इसका कारण मनमोहन सिंह और सोनिया हैं। देश की जनता इन दो अ-नेताओं से अपना पिंड छुड़ाने के लिए बेताब हो चुकी है। उसके सामने मोदी से बढिय़ा विकल्प कोई और नहीं है। दूसरे अर्थ में इस समय सोनिया और मनमोहन, मोदी के सबसे बड़े मित्र सिद्ध हो रहे हैं। मोदी की अखिल भारतीय स्वीकार्यता का भवन कांग्रेस की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार के खंभों पर खड़ा है। मोदी को अभी अपने पांवों पर खड़े होना बाकी है। क्या ऐसे में वे अपने साथी नेताओं, अपनी पार्टी, अपनी मातृ-संस्था संघ और अन्य सहयोगी दलों पर इंदिराजी की तरह चाबुक चला सकते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। इसके अलावा भाजपा और संघ, महात्मा गांधी की कांग्रेस की तरह कोई अराजक मंच नहीं हैं, लेकिन वे इंदिरा कांग्रेस की तरह प्राइवेट लिमिटेड कंपनी भी नहीं हैं। 2002 में अटलजी मोदी को पदमुक्त करना चाहते थे, लेकिन कर सके क्या? वे तो भाजपा के सर्वमान्य नेता थे, मगर उन्हें भी अपना ग्रास ठंडा करके खाना पड़ा। तो मोदी उबलती हुई खीर को कैसे निगल जाएंगे?

मोदी-निंदकों का अब एक तर्क यह है कि अटलजी को देश ने प्रधानमंत्री के तौर पर इसलिए स्वीकार किया कि उनके व्यक्तित्व की उदारता और संघ की 'सांप्रदायिकता' में एक कामचलाऊ संतुलन था, लेकिन मोदी और संघ का मेल तो ऐसा होगा, जैसा कि करेला और नीम चढ़ा। ऊपरी तौर पर यह तर्क वजनदार मालूम पड़ता है, लेकिन ये तर्कशास्त्री यह भूल गए कि अब यह करेला, वह करेला नहीं रहा और यह नीम, वह नीम नहीं रहा। 2002 की त्रासदी ने मोदी को जितना तपाया है, क्या किसी अन्य मुख्यमंत्री को वैसे आग के दरिया में से गुजरना पड़ा है? क्या उन्होंने कुछ नहीं सीखा होगा? और जहां तक संघ का सवाल है, मोहन भागवत ऐसे पहले सर संघचालक हैं, जो स्वतंत्र भारत में जन्मे हैं। वे जिन्ना की मुस्लिम लीग के भुक्तभोगी नहीं हैं। उदार हैं, आगे देखने वाले हैं, पीछे देखने वाले नहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो क्या भाजपा के 2014 के घोषणा-पत्र में जो लचीलापन और आधुनिकता हम देख रहे हैं, वह होती क्या? राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता पर आग्रह इस बार भी है, लेकिन उसमें दूर-दूर तक दुराग्रह की गंध भी नहीं है। इसके अलावा 'टीम इंडियाÓ का मुखिया अकेले नरेंद्र मोदी को घोषित नहीं किया गया है, वह बराबरी वालों का ऐसा समूह होगा, जिसमें मुख्यमंत्री भी सदस्य होंगे। इस समूह में किसी हिटलर या किसी मुसोलिनी के लिए कोई जगह कैसे निकल पाएगी?

यह ठीक है कि मोदी ने बड़े औद्योगिक घरानों को काफी छूट दी है, लेकिन इसी आधार पर यह मान बैठना कि मोदी का भारत थैलीशाहों का भारत हो जाएगा और गरीब लोग बेमौत मारे जाएंगे, अपनी कल्पनाओं को बेलगाम दौड़ाना है। मोदी को दुबारा प्रधानमंत्री बनने की ललक होगी या नहीं? भाजपा के 250-300 सांसद दुबारा जीतकर आना चाहेंगे या नहीं? वे किनके वोटों से जीतेंगे? देश के 40-50 धन्ना-सेठों के नोटों से या करोड़ों साधारण लोगों के वोटों से? क्या कांग्रेस की पराजय उन्हें कुछ नहीं सिखाएगी?

यह संदेह भी निराधार है कि मोदी के आने पर देश में दंगों की झड़ी लग जाएगी। गुजरात में 2002 में जो नर-संहार हुआ, वह भारत का कलंक था और उसमें अनेक बेकसूर भाइयों और बहनों को मौत के घाट उतारा गया। गुजरात का गुस्सा इतना भयावह था कि एक मोदी क्या, दस नेहरू भी उसे काबू नहीं कर सकते थे। जो बीत गई सो बात गई। अब आगे की सोचें। दंगे वाले एक साल की माला फेरते रहें और शांति वाले ग्यारह सालों को भूल जाएं, यह भी कोई बात हुई? कौन मुख्यमंत्री और कौन प्रधानमंत्री ऐसा हुआ है, जिसके यहां लगातार 11 साल तक शंाति और विकास का माहौल बना रहा है? हां, यह डर जरूर है कि सेक्युलरिज्म़ की ओट में अब सांप्रदायिक वोटों की फसल उगाना आसान नहीं होगा।


वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष
dr.vaidik@gmail.com