पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

सावरकर ने बढ़ाया कैदियों में भाईचारा

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
वीर सावरकर उन दिनों अंडमान जेल में थे। उनके सहित सभी कैदियों पर घोर अत्याचार किए जाते थे। उन्हें कोल्हू में बैल की जगह जोत दिया जाता था। असहनीय कष्ट के बीच उन लोगों का जीवन चल रहा था। ब्रिटिश अधिकािरयों का व्यवहार तो क्रूरतम था ही, लेकिन हिंदू व मुस्लिम कैदियों में भी अलगाव था। हिंदू कैदी संख्या में अधिक थे, किंतु वे लोग मुस्लिम कैदियों से बिदकते थे। इसका कारण यह था कि हिंदू परंपरावादी थे और आचार-विचार का बहुत ध्यान रखते थे। अंधविश्वास के कारण वे मुस्लिमों की छुई हुई कोई चीज उपयोग में नहीं लाते थे। अंडमान जलपोत पर जब भी कोई सामान उतारा जाता तो उसे हिंदू कैदियों के साथ मुस्लिम कैदियों के हाथ भी लगते। फिर हिंदू उसे ग्रहण नहीं करते, क्योंकि अज्ञानवश उन्हें धर्म भ्रष्ट होने का भय रहता था।
कुछ कैदी इस बात का फायदा उठाकर ऐसे कैदियों को परेशान करते। सावरकर ने जब यह सब देखा तो उन्होंने हिंदू कैदियों को गीता पढ़कर सुनाई। गीता के श्लोकों की युक्तियुक्त व्याख्या कर सावरकर ने उन्हें समझाया कि जब भी ऐसी विपरीत स्थिति हो तो भगवान का नाम लें। ऐसा करने से वह वस्तु शुद्ध हो जाएगी, क्योंकि हिंदू धर्म बहुत उदार और शक्तिशाली है, इसलिए वह सभी को अपने में समाहित करने की ताकत रखता है। सावरकर की ज्ञानपरक बातों ने हिंदू कैदियों को खुले दिमाग का बना दिया और उनमें साहस जाग गया। अब मुस्लिम कैदी उनकी निडरता की सराहना करने लगे। धीरे-धीरे मुस्लिम कैदियों का व्यवहार हिंदू कैदियों के प्रति सुधर गया अौर कैदियों में भाईचारा पैदा हो गया। निराशाजनक परिस्थितियों में सकारात्मक सोच रखने से ही उनसे उबरा जा सकता है। वही अंतत: बुरे दिनों को अच्छे दिनों में परिवर्तित करती है।