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किस राह पर चलेगा पाकिस्तान?

8 वर्ष पहले
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सत्ता के लोकतांत्रिक हस्तांतरण के बाद पाकिस्तान को उग्रवाद और उदारवाद में से किसी एक को चुनना होगा।
क्या नवाज शरीफ साबित करेंगे कि उन्होंने अपनी गलतियों से सबक सीखा है। जिस तरह वे उन्हें सहारा देने वाली फौज के खिलाफ खड़े हो गए थे, क्या वे उसी तरह उग्रपंथियों के खिलाफ खड़े होंगे, जिन पर वे कभी-कभार निर्भर रहे हैं।
पाकिस्तान के घटनाक्रम पर नजर डालते हुए हम दो वैकल्पिक बातों, जो एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं, पर गौर कर सकते हैं। यहां हम पहले अच्छी तस्वीर को देखते हैं।


66 वर्ष के इतिहास में पाकिस्तान में चुनाव के मार्फत सत्ता का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक हस्तांतरण हो रहा है। सेना हाशिये पर बैठने के लिए विवश है। पाकिस्तान के लिए यह निर्णायक मोड़ हो सकता है, जिसमें कि वह फौजी अफसरों की दया पर अनंतकाल तक नकली लोकतंत्र बने रहने के बजाय एक सामान्य लोकतंत्र रहे। भावी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पहले ही संकेत दे चुके हैं कि राजनीतिक ढांचे में सेना की अब वैसी भूमिका नहीं रहेगी, जैसी कि हुआ करती थी। और यह केवल सेना ही नहीं है, जिसे उसकी हैसियत बताई गई है।

चुनाव में 60 प्रतिशत मतदान तालिबान के मुंह पर तमाचा है, जिसने न सिर्फ लोकतंत्र के विचार का ही विरोध किया, बल्कि लोगों को मतदान केन्द्र पर जाने से रोकने की जी तोड़ कोशिश की। तालिबान को इस तथ्य से भी करारा झटका लगा है कि लगभग एक तिहाई मतदाता युवा हैं और उनमें से कई पहली बार वोट दे रहे थे और इससे संकेत मिला कि अगली पीढ़ी के बीच लोकतंत्र का विचार जड़ें जमा रहा है।


और अब दूसरे विकल्प पर गौर करते हैं। चुनाव परिणामों से पुष्टि होती है कि तालिबान जो चाहते थे वह उन्हें मिल गया है। चुनाव के दौरान उसका दहशत फैलाने का अभियान मुख्यत: धर्मनिरपेक्ष समझी जाने वाली पार्टियों- राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, असफंदयार वली खान की अवामी नेशनल पार्टी(एएनपी), अलताफ हुसैन की मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट(एमक्यूएम)- के खिलाफ था।

तालिबानी हमलावरों ने इन पार्टियों की सभाओं और उम्मीदवारों पर इतने घातक तरीके से प्रहार किया कि वे अच्छे से चुनाव प्रचार नहीं कर सके। नतीजे बताते हैं कि तालिबान का दहशत फैलाने का अभियान सफल रहा। धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की जबर्दस्त हार हुई, जबकि नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग(पीएमएल-एन) और इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ जैसी अनुदार और उग्रपंथियों के प्रति सहानुभूति रखने वाली पार्टियों ने शानदार सफलता हासिल की। अगर यह चुनाव निर्णायक मोड़ है तो यह पाकिस्तानी समाज के और अधिक उग्र होने और पाकिस्तानी राजनीति के और ज्यादा तालिबानीकरण का मोड़ माना जा सकता है।


इन दो में से कौन सी बात वास्तविकता के निकट है? भारत के नजरिये से यह बात महत्वपूर्ण है कि हम अधिक समस्याएं खड़ी करने वाले या कम अड़चन पैदा करने वाले पाकिस्तान को भविष्य में देखेंगे?
इन सवालों के कोई आसान जवाब नहीं हैं, क्योंकि पाकिस्तान दो विरोधाभासी स्थितियां प्रदर्शित कर रहा है। एक तरफ धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तानी स्वीकार करते हैं कि उनका समाज कम सहिष्णु, ज्यादा अनुदार और ज्यादा धाíमक हो रहा है।

यह प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा अभी हाल ही में किए गए एक सर्वे से भी प्रदर्शित होता है। इसके अनुसार 84 प्रतिशत पाकिस्तानी शरिया को अधिकृत कानून बनाना चाहते हैं। विश्वविद्यालयों और अन्य स्थानों पर हिजाब के बढ़ते प्रचलन और पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर के हत्यारे हुसैन कादरी को मिल रहा जनसमर्थन भी इसका प्रमाण है। गवर्नर का अपराध केवल यह था कि वे अल्पसंख्यकों को आतंकित करने वाले ईशनिंदा कानून की शिकार एक महिला को राहत दिलाना चाहते थे।


दूसरी तरफ मुख्यधारा के राजनीतिक दल, व्यवसाय जगत और जनमत बनाने वाले लोग इस बात को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं कि पाकिस्तान ने उग्रवाद को बढ़ावा देकर और भारत के प्रति आक्रामक रुख अपनाकर भारी कीमत चुकाई है और अब उसे आर्थिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए शांति की जरूरत है। यहां तक कि सेना भी बाहरी खतरों की बजाय आंतरिक खतरे की गंभीरता को महसूस करने लगी है।

मिसाल के लिए पिछले माह सैन्य मुख्यालय में हुए शहीद दिवस समारोह पर एक पाकिस्तानी अखबार में प्रकाशित खबर पर ध्यान दीजिए - ‘जैसे ही अतिथि बैठ गए दो परदे जगमगाने लगे जिनमें पुलिसकर्मियों और फौजियों को दाढ़ी वाले उग्रवादियों से लड़ते दिखाया गया। उग्र पंथियों को सेना के काफिलों पर हमला करते और निर्दोष नागरिकों की हत्या करते दिखाया गया। इस मामले में कोई अस्पष्टता नहीं है। सेना ने सोच लिया है कि नया दुश्मन तालिबान है’।


अभी समाप्त हुए चुनाव अभियान में कश्मीर और भारत कोई मुद्दा नहीं थे। इसके बजाय राजनीतिक दलों ने बिजली की कमी, ड्रोन हमले, अमेरिका से संबंध, भ्रष्टाचार और विकास के अभाव को लेकर एक-दूसरे को निशाना बनाया। हकीकत में यह कश्मीरी अलगाव वादियों को अच्छा नहीं लगा। यहां अलगाववादी नेता मोहम्मद यासीन मलिक के कथन पर ध्यान दीजिए- ‘किसी समय पाकिस्तान विदेश विभाग कश्मीर केन्द्रित था। लेकिन दुर्भाग्य से इस चुनाव अभियान से कश्मीर गायब था। मैं पाकिस्तानी नेतृत्व को संदेश देना चाहता हूं,क्या वे चाहते हैं कि कश्मीर के लोग पीड़ित होते रहें’?


ये दो विरोधाभासी बातें कैसे साथ-साथ चल सकती हैं? अगर देश का सत्ता प्रतिष्ठान स्वीकार करने लगे कि उग्रता और आक्रामकता की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है तो समाज कैसे अधिक उग्र और अनुदार हो सकता है? इसका एकमात्र जवाब है कि अलताफ हुसैन की एमक्यूएम को छोड़कर अधिकतर राजनीतिक दलों में उग्रवादी तत्वों के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं है, क्योंकि वे सोचते हैं कि इससे उनके वोट कम हो जाएंगे।

इसलिए उग्रता जारी है। सवाल है क्या नवाज शरीफ एक बार फिर साबित करेंगे कि उन्होंने अपनी गलतियों से सबक सीखा है। जिस तरह वे उन्हें सहारा देने वाली फौज के खिलाफ खड़े हो गए थे, क्या वे उसी तरह उग्रपंथियों के खिलाफ खड़े होंगे, जिन पर वे कभी-कभार निर्भर रहे हैं। तालिबान के खिलाफ कार्रवाई का साहस न जुटाने के बावजूद भी पीपीपी उसके कोप से नहीं बच सकी, यह तथ्य नवाज शरीफ को कुछ सोचने के लिए मजबूर करेगा।


टोनी जोसेफ
बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन