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संबंधों को समझदारीपूर्वक निभाएं

9 वर्ष पहले
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संसार के सारे रिश्ते या तो संयोग से बनते हैं या स्वार्थ से। जीवनभर मनुष्य इन्हें जानकर अनजाने में निभाता और ढोता भी है। लेकिन एक तीसरा तरीका मन द्वारा रिश्ता बनाने का भी होता है। मन को दूसरे से जुड़ने में बड़ी रुचि होती है।
भीड़ उसके लिए भोजन जैसी है। हमेशा दूसरे से भीतर ही भीतर चिपका रहता है। अप्राप्त स्थिति में सुख की कामना करना और उसकी खोज करते रहना ही उसका अविवेकपूर्ण स्वभाव होता है। और प्राप्त होते ही उसकी मांग और खोज के केंद्र बदल जाते हैं। अकेले रहने में उसे डर लगता है।
यही आदत बाहर भी काम करने लगती है। जरा मनुष्य बाहर अकेला हुआ तो डरेगा या फिर कई लोगों से घिरे रहने के बावजूद अकेला महसूस करेगा। हमें अपने रिश्तों को चार खानों में बांटकर जीने की कला अपनानी चाहिए। संबंधों का हमारा पहला स्तर बुद्धि का होगा, जिससे हमारी व्यावसायिक जिंदगी संचालित होगी। दूसरा स्तर संबंधों का हृदय से रखा जाए, इसका परिणाम प्रेम होगा।
निजी और पारिवारिक जीवन इसी से प्रभावित रहेगा। शरीर से तीसरे स्तर के संबंधों में भोग की जगह सेवा को प्राथमिकता दें। और मन से निर्मित संबंधों को योग से नियंत्रित करें। संबंधों को निभाने में या तो हम चतुराई रखते हैं या चालाकी से काम लेते हैं। इन चारों खानों में संबंधों को रखकर, समझकर निभाएं तो चालाकी और चतुराई का भी सही उपयोग कर सकेंगे। वरना आज के समय में संबंध भी सिर्फ सौदे बनकर रह जाएंगे।