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रसोई गैस की कमी हुई तो पूरे गांव में लगाया गोबर गैस प्लांट

6 वर्ष पहले
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भागलपुर. अगर कोई जिद करना सीखे तो शाहकुंड के अंबा गांव के किसान मृगेन्द्र प्रसाद सिंह से। एक बार एलपीजी संचालक ने गांव में रसोई गैस पहुंचाने में असमर्थता क्या जताई कि मृगेन्द्र ने पूरे गांव की तस्वीर ही बदल डाली। आज अंबा में 53 गोबर (बायो) गैस प्लांट लग गए हैं। दिखावे के लिए है एलपीजी सिलेंडर...
मृगेन्द्र के सहयोग से भागलपुर जिले में दो सौ गोबर गैस प्लांट लगे हैं। अब तो इस गांव में सिर्फ दिखावे का एलपीजी सिलेंडर कुछ लोगों के रसोई घर में है। बात 15 साल पहले की है, जब मृगेन्द्र ने गैस एजेंसी की अनदेखी के बाद गोबर गैस प्लांट लगाने की ठानी। इसके बाद उन्होंने एक बड़ी टंकी में गोबर जमा करना शुरू किया। मवेशी पालने का फायदा यह हुआ कि दो महीने में ही घर में एलपीजी का विकल्प गोबर गैस प्लांट तैयार कर लिया। चार-पांच महीने बाद जब वे इसमें सफल हो गए गांव वालों को इससे जोड़ने लगे।
शुरुआती दौर में मिली असफलता
गांव वाले गोबर का उपयोग उपला बनाने में करते थे। उन्हें लगता था कि गोबर गैस प्लांट में हमारा गोबर बर्बाद हो जाएगा। फिर मृगेन्द्र ने लोगों को ऐसे समझाया कि प्लांट में उपयोग किया जाने वाला गोबर मूलधन है और इससे तैयार ऊर्जा यानी गैस ब्याज है। यह बात गांववालों को जच गई। यहीं से गांव में बदवाल की बयार बह चली।
आइटीआई पास हैं मृगेंद्र
मृगेन्द्र ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। उन्होंने 78 में इंटर स्तर की आईटीआई भागलपुर से की थी। मोकामा में कुछ दिन सरकारी नौकरी भी की। पगार महज 120 रुपये के कारण उन्होंने नौकरी छोड़ दी और गांव में ही खेती करने लगे। बाद में कुछ सीखने की ललक के कारण भागलपुर में संचालित किसान विद्यापीठ से जुड़ गए। यहीं अवैतनिक अध्यापक बन गए।
जिले में पहली जैविक खेती भी शुरू की
मृगेंद्र के सिर भागलपुर में पहली जैविक खेती करने का भी रिकार्ड है। नई दिल्ली के आईसीएआर पूसा विश्वविद्यालय में एक सेमिनार में आयोजित कार्यक्रम में जैविक खेती के तरीके, फायदे के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने अपनी कुछ जमीन पर जैविक खेती शुरू की। धीरे-धीरे उनकी प्रेरणा पर भागलपुर, बांका, नवगछिया इलाके के कई किसान भी जैविक खेती करने लगे। इसके लिए उन्हें किसानश्री का पुरस्कार भी दिया गया।
किसान चाचा के नाम से मशहूर
परिवारिक खेती सह समेकित कृषि प्रणाली का आदर्श माॅडल पेश करने के कारण उनका उपनाम किसान चाचा हो गया है। उन्हें गांवों में किसानी पर आयोजित परिचर्चा में बुलाकर उनके अनुभव को सुना जाता है। कैसे वे मात्र पांच डिसमिल (200 वर्ग मी.) जमीन से गोबर गैस प्रणाली अपनाकर प्रति वर्ष दो लाख की कमाई करते हैं।
मास्टर ट्रेनर हैं मृगेंद्र
मृगेन्द्र कृषि विज्ञान केन्द्र सबौर, जिला कृषि कार्यालय, आत्मा, पौधा संरक्षण, उद्यान विभाग के मास्टर ट्रेनर हैं। वे आम बोलचाल की भाषा में लोगों तक सरकारी योजनाओं की बात पहुंचाते हैं। बिहार के अलावा तमिलनाडु और उड़ीसा में भी वे किसान को प्रशिक्षित कर चुके हैं। तकरीबन सभी राज्यों में स्थापित कृषि संस्थानों में वे प्रशिक्षण भी प्राप्त कर चुके हैं।