(बिहारशरीफ से 18 किलोमीटर दूर यह वह मंदिर है जहां सदियों पुरानी परंपरा के कारण नौ दिनों तक मंदिर में महिलाएं नहीं जा सकतीं)
बिहारशरीफ. बिहारशरीफ से 18 किलोमीटर दूर गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में मां आशा देवी का भव्य मंदिर है। इस सिद्धपीठ में नवरात्र के दौरान महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। दूर-दूर के श्रद्धालु इस मंदिर मे आते हैं। ऐसी मान्यता है, कि यहां सच्चे दिल से मांगी गई मन्नत मां आशा अवश्य पूरी करती हैं। इसे माता के 84 सिद्धपीठों से एक माना जाता है। इस मंदिर कि ख्याति काफी दूर-दूर तक फैली है। सालों भर यहां मुंडन व
विवाह सहित शुभ कार्य होते हैं।
सिद्धियां प्राप्त करने पहुंचते हैं तांत्रिक
नवरात्र के अवसर पर यहां मां आशा की विशेष पूजा की जाती है जिसे वाम पूजा या तंत्र पूजा कहा जाता है। नवरात्र मे कई जगहों से तांत्रिक यहां आकर सिद्धियां प्राप्त करने के लिए तंत्र साधना करते हैं, जिसके कारण नवरात्र के नौ दिनों तक महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी रहती है। यह परम्परा सदियों पुरानी है। निशा पूजन के बाद यहां पशुओं की बलि दी जाती है और निशा आरती के बाद ही महिलाओं को माता के दर्शन की अनुमति मिलती है। कहा जाता है कि तंत्र पूजा मे महिलाओं के शामिल होने से साधना भंग होती है।
मंदिर के पुजारी पुरेंदर उपाध्याय बताते हैं कि जातक कथाओं में सिद्धि के लिए महिलाओं को बाधक माना गया है। सिद्धपीठ होने कि बात उन कथाओं मे उल्लेखनीय है। इस मंदिर मे आशा देवी की मूर्तियों के अलावा शिव-पार्वती और भगवान बुद्ध की भी मूर्तियां हैं। नौवीं शताब्दी मे वज्रयान, तंत्रयान और सिद्धियान का बहुत तेजी से फैलाव हुआ था।
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