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पिंडवेदी तक पहुंचने के लिए गया में पालकी उठा 500 परिवारों का भरते हैं पेट

7 वर्ष पहले
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गया. मोक्षधाम आने वाले तीर्थयात्री प्रेतशिला अवश्य पहुंचते हैं। प्रेतशिला पर्वत शिखर पर पिण्डवेदी व शिवलिंग स्थापित है। पर्वत शिखर पर पहुंचने के लिए 676 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। वृद्ध अथवा लाचार श्रद्धालु इतनी ऊंचाई तय नहीं कर पाते। इन्हें ऊपर तक ले जाने और वापसी के लिए करीब दो सौ पालकी यहां उपलब्ध हैं। पौराणिक जमाने की तर्ज पर छोटी खाट की बनी इस पालकी को ढोने वाले अधिकांश लोग पड़ोस के शेरपुर गांव के हैं। बिरजू मांझी, गणेश दास, सकलदेव दास, दीनानाथ प्रसाद, जगदीश यादव, सतीश कुमार बताते हैं कि यह उनका पुश्तैनी पेशा है। पितृपक्ष में यात्रियों की भीड़ अधिक होती है। एक खेप का 500 से 600 रुपये उन्हें मिल जाता है। 

एक पालकी को दो लोग उठाते हैं। वजनदार यात्री होने पर चार लोगों को लगना पड़ता है। इन लोगों ने बताया कि सालों भर यहां यात्री आते हैं। वैसे खाली वक्त में वे खेत में भी काम कर लेते हैं। यहां पालकी ढोने के लिए उन्हें किसी प्रकार की ठेकेदारी नहीं देनी होती है।इस कार्य में लगे लोगों का कहना है कि शेष दिनों में बेरोजगारी के कारण रोटी के लाले पड़ जाते हैं।
 
चन्द्र लोक के निकट है पितृलोक
 
सत्रह दिन में गया श्राद्ध पूर्ण करने वाले श्रद्धालु अष्टम दिवस अर्थात् सप्तमी तिथि को विष्णुपद प्रांगण में ही विष्णुपद से अग्निकोण पर स्थित सोलह वेदी में चन्द्र पद पर पार्वण श्राद्ध संपन्न करें। इससे चन्द्रमा द्वारा पितरों को अमृत प्राप्त होता है। गणेश पद पर श्राद्ध करने से रुद्र लोक पितरों को मिलता है। तत्पश्चात सभ्याग्नि पद पर श्राद्ध करें। इसके बाद आवसध्याग्नि पद पर श्राद्ध सम्पन्न करें।
 
इससे यात्री (पितर) चन्द्र लोक में अपने पूर्व पितरों को प्राप्त करता है। पितृलोक भी चन्द्र लोक के निकट ही है। यहां सभी वेदियां गया नामक असुर के पवित्र शरीर पर रखी परम पवित्र धर्मशिला पर स्थित हैं। गयासुर के शरीर पर प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ किया था। यज्ञान्त में उसका शरीर कम्पित होने लगा। उसे अचल करने के लिए उसके शरीर पर धर्मशिला रख दी गयी फिर भी शरीर चंचल रहने के कारण धर्मशिला पर श्री विष्णु भगवान ने दाहिना चरण रखकर अचल कर दिया। 
               
प्रस्तुति: आचार्य नवीन चन्द्र मिश्र
 
 
(यात्री को पालकी पर बैठा सीढ़ियां उतर रहे  स्थानीय युवक)