गया. उत्तराखंड की भीषण त्रासदी में मरे और लापता लोगों का गया में
श्राद्ध किया जा रहा है। उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए विभिन्न राज्यों के लोग बड़ी संख्या में गया पहुंच रहे हैं। इनके द्वारा गया श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण किया जा रहा है। हरियाणा गुड़गांव जिला के तहसील पटौदी की दम्पती प्रभा शर्मा और नत्थू राम गया आए हैं। प्रभा शर्मा ने बताया कि उनकी मां शांति देवी और भाई शंकर लाल गांव के पन्द्रह लोगों के साथ केदारनाथ धाम गए थे। सभी लापता हो गए। दम्पती ने बताया कि अपने परिजन समेत मारे गए समस्त लोगों के लिए श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के कई परिवार भी इस निमित्त गयाधाम पहुंचे हुए हैं।
सौभाग्यकांक्षिणी स्त्रियों का सीताकुण्ड में श्राद्ध
त्रैपाक्षिक सत्रह दिनों तक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु दसवें दिन अर्थात नवमी तिथि को गदाधर भगवान से पूरब महानदी फल्गु का दर्शन कर पूरब तट पर जाते हैं। राम गया भरताश्रम आकर पहले श्री राम को प्रणाम किया जाता है। यहां श्राद्ध सम्पन्न करने के बाद फिर सीताकुण्ड के पास ही नदी तीर पर सौभाग्यवती स्त्रियां अपने बाएं हाथ से बालूकामयी तीन पिण्ड अपने पितरों को देती हैं। माता सीता ने पहला पिण्ड सौभाग्य प्राप्ति, दूसरा पिण्ड पितरों की मुक्ति तथा तीसरे पिण्ड में मातृ पक्ष के मुक्ति की कामना से दिया था। वही आज भी प्रचलित है। यह कथा विख्यात है कि प्रभु श्री राम-लक्ष्मण साथ सीता अपने पितरों के निमित्त गया श्राद्ध करने आये थे।
सीता को नदी तीर पर छोड़ स्वयं दोनों भाई श्राद्धीय सामग्री एकत्रित करने गए। श्राद्ध काल व्यतीत होने पर श्री दशरथ जी की आत्मा का आगमन हुआ और पुत्रवधू से पिण्डदान को कहा। उन्हीं के आदेशानुसार सामग्री के अभाव में भी बालू के पिण्ड से श्राद्ध सम्पन्न किया। श्री राम के आने पर श्राद्ध सम्पन्नता की सूचना में फल्गु, ब्राह्मण, तुलसी, केतकी के फूल और गौ ने झूठी गवाही दी। फलतः इन लोगों को माता के कोप भाजन का शिकार होना पड़ा और वट वृक्ष ने सत्य गवाही देकर अक्षय होने का वरदान प्राप्त किया। अतः यह वरदान और शाप दोनों सिद्ध हैं। यहां श्राद्ध सम्पन्न कर के सौभाग्य पिटारी का दान करें।
प्रस्तुति: आचार्य नवीन चंद्र मिश्र ‘वैदिक’
( विष्णुपद मंदिर में श्राद्धकर्म करते उत्तराखंड में लापता लोगों के परिजन। )