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दरभंगा महाराज के घर के अंदर चलती थी रेल, ऐसी थी शान-ओ-शौकत!

दरभंगा नरेश कामेश्वर सिंह अपनी शान-शौकत के लिए पूरी दुनिया में विख्यात थे।

Dainik Bhaskar

Oct 10, 2013, 12:00 AM IST
Uknown and amazing facts about Darbhanga maharaj
दरभंगा नरेश कामेश्वर सिंह अपनी शान-शौकत के लिए पूरी दुनिया में विख्यात थे। अंग्रेज शासकों ने इन्हें महाराजाधिराज की उपाधि दी थी। वे जहां अंग्रेजों के विश्वासी और कृपापात्र शासक थे। वहीं, महात्मा गांधी उन्हें अपने बेटे के समान मानते थे। दरभंगा महाराज भी गांधी जी के बेहद करीब थे। आजादी से पहले उन्होंने महात्मा गांधी की एक प्रतिमा बनवाई थी, जिसे विंस्टन चर्चिल की भतीजी प्रख्यात कलाकार क्लेयर शेरीडेन ने बनाया था। इस प्रतिमा का प्रदर्शन तत्कालिक गवर्नमेंट हाउस (वर्तमान में राष्ट्रपति भवन) में किया गया था।
इसका खुलासा 1940 में महात्मा गांधी द्वारा लॉर्ड लिनलिथगो की चिट्ठी से हुआ। गांधी जी जब 1947 में बिहार भ्रमण करने गए थे तब एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि दरभंगा महाराज बहुत ही अच्छे इंसान हैं। वे मेरे लिए पुत्र के समान हैं। बता दें कि महाराज कामेश्वर सिंह का जन्म जहां 1907 में हुआ था, वहीं उनकी मौत 1962 में हुई थी। कामेश्वर सिंह दरभंगा के आखिरी महाराज थे।
दरभंगा महाराज ने कई ऐसे काम किए, जिससे ज्यादातर लोग आज भी अंजान हैं। ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसे महाराज के बारे में जिसके घर की सीढ़ियों तक बिछी हुई थी रेल पटरियां, साथ में जानें ऐसे ही कुछ आश्चर्यजनक और अद्भुत फैक्ट्स...
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यह बिहार का एकमात्र राजपरिवार था जिसके घर की सीढ़ियों यानी रानी महल तक रेल पटरी बिछी थी जो आज भी मौजूद है। दरभंगा महाराज के पास बड़ी लाइन और छोटी लाइन के लिए अलग-अलग सैलून थे। इनमें वे सफर के दौरान आराम फरमाया करते थे। इसमें न केवल कीमती फर्नीचर थे, बल्कि सोने-चांदी भी जड़े थे। कालांतर में सैलून बरौनी के रेलवे यार्ड में रख दिए गए। दरभंगा महाराज के पास दो बड़े जहाज भी थे।
 
जब दुनिया में दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था, उस दौरान दरभंगा महाराज ने एयरफोर्स को तीन फाइटर प्लेन दिए थे। इसके पीछे का मकसद ये था कि विश्वयुद्ध में भारत में राज करने वाले अंग्रेजों की फौज कामयाब हो। चूकि वे महात्मा गांधी के साथ-साथ अंग्रेजों के भी विश्वासी थे। दरभंगा महाराज ने अंग्रेजों की सेना में कार्यरत प्रत्येक हिंदु तथा सीख सैनिकों को 5-5 हजार रूपए त्योहार मनाने के लिए दिए थे। इसके अलावा आर्मी मेडिकल कॉर्प के लिए 50 एम्बुलेंस भी डोनेट किए थे।
( फोटो साभार- भारत रक्षक डॉट कॉम)
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महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर इंडियन नेशनल कांग्रेस के फाउंडर मेंबर थे। अंग्रेजों से मित्रतापूर्ण संबंध होने के बावजूद वे कांग्रेस की काफी आर्थिक मदद करते थे। महाराजा कामेश्वर सिंह के उपर एक किताब प्रकाशित हुई थी, जिसका नाम ' करिज एंड बनेवलंस: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह' है। इस किताब की माने तो दरभंगा महाराज ने कई दिग्गज नेताओं की भी मदद की थी। इनमें देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, जयपुर के महाराजा, रामपुर के नवाब के अलावा साउथ अफ्रीका के स्वामी भवानी दयाल संन्यासी सरीखे लोग शामिल हैं।
(डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ बैठे महाराज कामेश्वर सिंह)
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दरभंगा महाराज देश के सबसे बड़े जमींदार होने के साथ-साथ एक बहुत बड़े इंडस्ट्रीयल भी थे। उनके 14 इंडस्ट्रीयल यूनिट्स हैं, जिसमें सुगर, आयरन, स्टील, प्रिंट मीडिया आदि के कारोबार शामिल थे। इन कंपनियों की शुरुआत उन्होंने नए जमाने के रंग को भांप कर की थी। इससे बहुतों को रोजगार मिला और राज सिर्फ किसानों से खिराज की वसूली पर ही आधारित नहीं रहा। आय के नये स्रोत बने। इससे स्पष्ट होता है कि दरभंगा नरेश आधुनिक सोच के व्यक्ति थे।
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दरभंगा महाराज का क्षेत्र 2500 स्क्वायर माइल में फैला था, जिसमें बिहार और बंगाल के 4,495 गांव और 18 सर्किल आते थे। इन क्षेत्रों के देख-रेख का जिम्मा 7,500 अधिकारियों का था। दरभंगा महाराज ने शैक्षिक संस्थानों के विकास के लिए भी काफी मदद की है। किताब के अनुसार उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पटना यूनिवर्सिटी और बिहार यूनिवर्सिटी में भी मदद की थी।
(इंदिरा गांधी के साथ महाराजा कामेश्वर सिंह)
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दरभंगा महाराज संगीत और अन्य ललित कलाओं के बहुत बड़े संरक्षक थे। 18वीं सदी से ही दरभंगा हिंदुस्तानी क्लासिकल संगीत का बड़ा केंद्र बन गया था। उस्ताद बिस्मिल्ला खान, गौहर जान, पंडित रामचतुर मल्लिक, पंडित रामेश्वर पाठक और पंडित सियाराम तिवारी दरभंगा राज से जुड़े मशहूर संगीतज्ञ थे। उस्ताद बिस्मिल्ला खान तो कई वर्षों तक दरबार में संगीतज्ञ रहे। कहते हैं कि उनका बचपन दरभंगा में ही बीता था। गौहर जान ने साल 1887 में पहली बार दरभंगा नरेश के सामने प्रस्तुति दी थी। फिर वह दरबार से जुड़ गईं।

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दरभंगा राज ने ग्वालियर के मुराद अली खान का बहुत सहयोग किया। वे अपने समय के मशहूर सरोदवादक थे। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह स्वयं एक सितारवादक थे। ध्रुपद को लेकर दरभंगा राज में नये प्रयोग हुए। ध्रुपद के क्षेत्र में दरभंगा घराना का आज अलग स्थान है।

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महाराज कामेश्वर सिंह के छोटे भाई राजा विश्वेश्वर सिंह प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और गायक कुंदनलाल सहगल के मित्र थे। जब दोनों दरभंगा के बेला पैलेस में मिलते थे तो बातचीत, गजल और ठुमरी का दौर चलता था। राज बहादुर के विवाह समारोह में कुंदनलाल सहगल आए थे और उन्होंने हारमोनियम पर गाया था - 'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए।' दरभंगा राज का अपना फनी ऑरकेस्ट्रा और पुलिस बैंड था।
(अपने पिता के साथ महाराजा कामेश्वर और छोटे भाई विशेश्वर)
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