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दहेज के खिलाफ 157 साल पहले बिहार से उठी थी आवाज, तब ऐसे थे हालात

4 वर्ष पहले
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पटना.   तिलक-दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ राज्य में शुरू जागरूकता अभियान की तरह ही 1860 के दशक में भी बिहार में एक समाज सुधार आंदोलन शुरू हुआ था। उस समय राजघरानों और समृद्ध परिवारों के बीच हावी यह कुरीति छोटी जमातों को भी जकड़ने लगी थी। तब मुंशी प्यारेलाल ने कमान संभाली थी। यह बिहार ही नहीं, देश में दहेज के खिलाफ अनूठा मूवमेंट था। शाहाबाद के गोपालपुर गांव निवासी प्यारेलाल सरकारी नौकरी में थे। नौकरी छोड़कर वे इस आंदोलन में जुट गए। उन्हें पश्चिमोत्तर प्रांत के गवर्नर सर विलियम मूर का खुला समर्थन मिला। इसके अलावा डुमरांव, दरभंगा और हथुआ राज का भी साथ मिला। 

अंजुमन ए हिंद संगठन बनाया, तय किए गए नियम

 

प्यारेलाल दयानंद सरस्वती, केशवचंद सेन, राणाडे सरीखे समाज सुधारकों के समकालीन थे। पर उन्होंने उनकी तरह किसी पंथ की स्थापना नहीं की। उन्होंने ‘सदर अंजुमन ए हिंद’ नामक संगठन की स्थापना की। 1868 में अंजुमन की पहली शाखा आरा में खुली। शीघ्र ही सभी जिलों में शाखाएं फैल गईं। सदस्यों के लिए नियम बने। समृद्धों के लिए तिलक की अधिकतम राशि 125 रु. व बारात की संख्या तय की गई। पटना से प्रकाशित अल-पंच ने इस कुरीति पर प्रहार किया। लिखा कि बेटे वालों के लिए दहेज में कारू का खजाना भी कम है। बांकीपुर के चश्म-ए-इल्म ने 18 नवंबर 1873 में 3 राजाओं व 15 लोगों के बीच इकरारनामे को प्रकाशित किया जिसमें दहेज के खर्च को कम करने की बात थी। (जेएस झा, एजुकेशन इन बिहार)

 

एक गलती ने आंदोलन को किया कमजोर

 

 

1876 में प्यारेलाल सौराठ सभा गए। 1877 में अंजुमन के तय मापदंडों के आईने में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने 2,289 शादियों को परखा। (जेएस झा- बायोग्राफी ऑफ लक्ष्मीश्वर सिंह)। सभाओं में प्यारेलाल द्वारा वैवाहिक खर्च को नियंत्रित करने के लिए बनाए नियम स्वीकार किए जाने लगे। इस बीच उनसे एक गलती हो गई। वे एक ऐसी शादी में चले गए जिसमें उनके ही बनाए नियम की धज्जियां उड़ीं। जिस बारात में वे शामिल हुए थे वह दो दिन की थी। इससे नाराज पटना के डिस्ट्रिक्ट जज प्रिंसेप, जो पटना सदर अंजुमन के अध्यक्ष थे, ने विवाह समिति से इस्तीफा दे दिया। पटना के रईसों ने कुलीनता की आड़ में आंदोलन को कमजोर कर दिया। 

 

50 साल बाद जनकधारी बाबू को बापू का जवाब 


मुजफ्फरपुर के कांग्रेसी जनकधारी प्रसाद ने 1945 में बेटी के ब्याह की चिंता में गांधीजी से सलाह मांगी। गांधीजी ने 7 अप्रैल को जवाब दिया- बेटी के लग्न के लिए एक कौड़ी न खर्चो, वे बड़ी होंगी, अपना पति आप ढूंढ लेंगी…। (स्वर्ग पर धावा : बिहार में दलित आंदोलन)

 

तब ऐसे थे हालात

- बुकानन ने 1812-13 की शाहाबाद रिपोर्ट में लिखा है कि डुमरांव महाराज ने बेटी की शादी की तैयारियों पर 20,000 रुपए खर्च किए थे।

- केके दत्ता ने कुंवर सिंह व अमर सिंह की जीवनी में लिखा है कि कर्ज में डूबे बाबू कुंवर सिंह ने पोती की शादी में 10,300 रुपए खर्च किए और पोते की बारात 10 दिनों में गिद्धौर पहुंची। इतना दिन ही लौटने में लगा। पांच दिन का पड़ाव था।

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