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कभी खुद बेसहारा थीं, आज सात हजार महिलाओं के लिए सहारा

5 वर्ष पहले
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पंकज कुमार सिंह|पटना @pankajksingh123

कभीखुद के परिवार का भरण-पोषण मुश्किल था और आज नालंदा जिले के बिंद प्रखंड की उतरथू की विमला कुमारी 7 हजार से अधिक परिवारों को इज्जत से रोजी-रोटी दिला रही हैं। विमला ने समाज के ताने व्यंग्यवाण सहकर भी स्वयं सहायता समूहों का लगातार गठन कराया और इससे जुड़ी महिलाओं को विभिन्न रोजगारों से जोड़ा। पहले खुद समिति बनाई। फिर इससे दर्जनभर महिलाओं को जोड़ा। कारवां बढ़ता गया और आज इन्होंने 657 स्वयं सहायता समूहों का गठन करा दिया है। इन्होंने 3 करोड़ से अधिक की पूंजी निर्माण किया। वह मुर्गीपालन, मशरूम उत्पादन, सब्जी दुकान, सिलाई मशीन आदि के माध्यम से सात हजार से अधिक महिलाओं को स्वावलंबी बना चुकी हैं। उन्हें महिला सशक्तीकरण सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

विमला देवी {जन्म : 1972

{मैट्रिक : 1986 प्रथम श्रेणी

{इंटरमीडिएट : 1988 द्वितीय श्रेणी

विमला कुमारी (दाएं) फाइल फोटो

मुर्गीपालन, बकरीपालन, गाेपालन, सिलाई-कढ़ाई, मशरूम उत्पादन, सब्जी बिक्री, अगरबत्ती मोमबत्ती बनाना, बैग थैला बनाना।

2015 में प्राधिकार द्वारा सहकारी समिति में निर्विरोध अध्यक्ष बनीं। विमला ने बिंद में कुल 657 स्वयं सहायता समूहों का गठन एवं पोषण, बैंक लिंकेज आदि कराया। समूहों की संख्या एवं बैंक लिंकेज पर सरकार ने खूब सराहना की। इस काम के लिए महिला विकास निगम ने पिछले वर्ष मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना के तहत बिंद में सामुदायिक संपत्ति यानी कार्यालय भवन का निर्माण कराया है। विमला ने महिलाओं को बचत करने के लिए प्रेरित किया। इससे वे रोज सब्जी बेचकर और अन्य कार्य कर कमाती और फिर बचत करती हैं। इससे महिलाओं के साथ उनके परिवार में खुशियां बिखरने लगी है। आज विमला के बेटे ने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली है।

2005 में महिला विकास निगम के माध्यम से विमला कुमारी ने स्वयं सहायता समूह के गठन एवं पोषण एनिमेटर का काम शुरू किया। सुगम नारीशक्ति महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति की वह अध्यक्ष बनीं। इस समिति के माध्यम से महिलाओं को रोजगार के लिए ऋण दिलाती हैं। ब्याज दर मात्र डेढ़ प्रतिशत लिया जाता है। प्रतिमाह महिलाओं की बचत 67 लाख से अधिक है। करीब डेढ़ करोड़ का ऋण बैंकों के माध्यम से दिलाया गया है। 2007-08 में स्वावलंबन परियोजना के तहत 100 स्वयं सहायता समूहों का गठन करा दिया। साक्षात्कार के आधार पर वह मुख्य कार्यपालक बनीं। महिला विकास निगम एवं आईसीडीएस ने 2009-10 में महिलाओं और बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी महिलाओं के स्वयं सहायता समूह को दी। इससे सुगम नारीशक्ति महिला सहकारी समिति को कुछ आय भी हुई।

आसान नहीं थी राह

बचपनसे ही विमला की राह कठिन रही। छोटी उम्र में ही मां का निधन हो गया। शादी के महज छह साल बाद ही पति भी सड़क हादसे में चल बसे। तीन बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी गई। सिलाई मशीन चलाकर कुछ कमाई होती थी, पर बच्चों की पढ़ाई के लिए आमदनी काफी कम थी। महिलाओं को संगठित करने के लिए एक संस्था में उत्प्रेरक का काम करने लगीं। इससे उन्हें 1500 रुपए महीना मिलता था। लोग कहते पैसे ठग कर चली जाएगी। जब महिलाओं को रोजगार मिलने लगा तो खुद लोग उनसे जुड़ने लगे।

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