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लिपिकों से ज्यादा मिले वेतन की वसूली पर 2 माह की रोक

5 वर्ष पहले
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बार काउंसिल का क्या औचित्य जब वह लॉ कॉलेजों को समय से मान्यता नहीं दिला सके : हाईकोर्ट

पटनाहाईकोर्ट ने राज्य के पत्राचार लिपिकों के वेतनमान को घटानेवाले वित्त विभाग के 14 सितंबर, 2015 के आदेश को आठ हफ्ते के लिए प्रभावहीन करते हुए सरकार द्वारा उनसे वेतन वसूली पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी की एकलपीठ ने करीब दो दर्जन रिट याचिकाओं को निष्पादित करते हुए वित्त विभाग को आदेश दिया कि अगले आठ हफ्तों में वह फिर से एक आदेश पारित करे कि पत्राचार लिपिकों का वेतनमान सीनियर एकाउंट्स क्लर्क के वेतन के बराबर होगा या नहीं। तबतक के लिए उन्हें पहले से दिए जा रहे वेतनमान का लाभ मिलता रहेगा और उनसे कोई भी वसूली नहीं होगी।

विदित हो कि राज्य के समाहरणालयों विभागीय कार्यालयों में कॉरेस्पोंडेंट क्लर्क का वेतनमान सीनियर एकाउंट्स क्लर्क के बराबर जुलाई, 2015 में कर दिया गया था। बाद में वित्त विभाग ने अपने ज्ञापांक 8059 द्वारा 14 सितंबर, 2015 से पत्राचार लिपिकों के वेतनमान को पुनः घटा दिया और अतिरिक्त वेतन वसूली की कार्रवाई का आदेश दिया था, जिसे चुनौती दी गई थी।

पेंशननिर्धारण में पूर्व की सेवा को जोड़ने का मामला पूर्णपीठ में

राज्यकर्मियोंकी पेंशन के निर्धारण में उनकी पिछली सेवा जो राज्य के ही बोर्ड, कॉरपोरेशन में की गई है, उसकी गणना होगी या नहीं इस कानूनी बिंदु पर हाईकोर्ट के तीन जजों की पूर्णपीठ फैसला करेगी। न्यायमूर्ति नवनीति प्रसाद सिंह नीलू अग्रवाल की खंडपीठ ने हरिशंकर प्रसाद अन्य की रिट याचिकाओं को सुनते हुए मामले को सुनवाई के लिए फुल बेंच में भेजा। याचिकाकर्ताओं के वकील विंध्याचल सिंह ने कोर्ट को बताया कि खाद्य आपूर्ति विभाग के दर्जनों कर्मी राज्य की सेवा में जाने से पहले बिहार राज्य खाद्य निगम के कर्मी थे। निगम राज्य का ही उपक्रम है, अतः उसकी सेवा की भी पेंशन निर्धारित करते वक्त गणना की जानी चाहिए। 2004 में ही तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने बोर्ड, निगमों में दी हुई सेवा को पेंशन निर्धारण के लिए विचार करने को सही करार दिया है।वहीं सरकार का पक्ष रखते हुए अपर महाधिवक्ता संख्या 6 अंजनी कुमार ने कोर्ट को बताया कि निगम, बोर्ड, कंपनी अथवा सहकारिता क़ानून से जन्म लेते हैं और उनकी खुद की सेवा शर्तें और नियमावली होती है, जहां पेंशन नहीं होकर प्रोविडेंट फंड का प्रावधान है। उक्त बोर्ड, निगम का अस्तित्व सरकारी विभाग से अलग और स्वतंत्र होता है, इसलिए वहां दी गई सेवा राज्य सरकार की में दी गई सेवा का हिस्सा नहीं हो सकती और ही पेंशन निर्धारण का। इसी बिंदु पर 2006 में पारित दूसरी खंडपीठ के फैसले का हवाला दिया। दो खंडपीठों के विरोधाभासी फैसले को देखते हुए मामला फुल बेंच को भेजा गया।

शिक्षकों के मनमाने स्थानांतरण पर मांगा जवाब

डॉश्रीभगवान सिंह की लोकहित याचिका को सुनते हुए कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी को तीन हफ्ते में जवाब देने को निर्देश दिया है। आरोप है कि यूनिवर्सिटी ने 2014 में बड़े पैमाने पर शिक्षकों का स्थानांतरण किया। इसमें कम छात्रों वाले कॉलेजों में बहुत शिक्षक और बहुत छात्रों वाले कॉलेजों में कम शिक्षकों को स्थानांतरित किया गया।

अपरसत्र न्यायाधीशों को क्यों दी शक्ति

पटनाजिला कोर्ट बार असोसिएशन की तरफ से दायर जनहित याचिका को सुनते हुए कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने हाईकोर्ट प्रशासन से दो हफ्ते में जवाब देने को कहा है कि जब दंड प्रक्रिया संहिता में अग्रिम जमानत को सुनने की शक्ति सत्र न्यायाधीश के पास है, तो किस आधार पर अपर सत्र न्यायाधीशों को अग्रिम जमानत सुनने की शक्ति दी गई।

शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों में शिक्षकों की कमी पर जवाब तलब

कार्यकारीमुख्य न्यायाधीश इकबाल अहमद अंसारी न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने जनार्दन हेम्ब्रम की जनहित याचिका को सुनते हुए शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों में शिक्षकों की कमी पर शिक्षा विभाग से जवाब तलब किया है। अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होगी।

बढ़चला बिहार में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित

कार्यकारीमुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने राज्य सरकार के बढ़ चला बिहार कार्यक्रम को चुनौती देने वाली नागरिक अधिकार मंच की जनहित याचिका को सुनकर फैसला सुरक्षित कर लिया। इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश से उक्त कार्यक्रम के विज्ञापन में सभी तरह के पोस्टर और ऑडियो वीडियो कार्यक्रम में मुख्यमंत्री की तस्वीर के प्रयोग पर रोक लगाई थी।

मंगलवार को महाराजगंज के सांसद जनार्दन सिंह सीग्रीवाल के निर्वाचन को चुनौती देने वाली प्रभुनाथ सिंह की चुनावी याचिका में याचिकाकर्ता के गवाही बंद हुई और उत्तरवादी को गवाह प्रस्तुत करने का आदेश न्यायमूर्ति केके मंडल की एकलपीठ ने दिया। याचिकाकर्ता की तरफ से कुल 13 गवाह थे, पर मात्र चार गवाही के बाद प्रभुनाथ सिंह के अनुरोध पर उनकी तरफ से गवाही को बंद किया गया। मंगलवार को सीग्रीवाल के वकील सर्वदेव सिंह ने प्रभुनाथ सिंह से उनके आपराधिक इतिहास पर प्रश्न पूछे, जिससे बतौर गवाह याचिकाकर्ता थोड़े असहज हो उठे। याचिकाकर्ता की तरफ से वरीय अधिवक्ता पीके वर्मा ने सर्वदेव के कई प्रश्नों पर आपत्ति की। सिग्रीवाल की तरफ से 130 गवाहों की लंबी सूची कोर्ट में डाली गई, जिसका विरोध पत्र प्रभुनाथ सिंह की ओर से दायर किया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि ऐसा सुनवाई को लंबा खींचने के लिए किया जा रहा है। अगली सुनवाई 18 फरवरी को होगी।

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