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कालिदास रंगालय } मोहनराकेश के आधे-अधूरे का हुआ मंचन

5 वर्ष पहले
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जिंदगीमें प्रेम किसी रहस्य से कम नहीं रहा है। प्रेम की चाहत में इंसान हमेशा भागता रहता है। किसी के करीब जाकर दिल को सुकून मिले ऐसे इंसान को हम हमेशा तलाशते रहते हैं, लेकिन किसी भी रिश्ते में तभी संपूर्णता आती है जब साथी रिश्तों के प्रति ईमानदार हो, रिश्तों में लगाव बना रहे और प्रेम को भरपूर जीने का मौका मिले। ऐसा नहीं होने पर हम कहने को रिश्ते में होते जरूर हैं लेकिन सही मायनों में उस रिश्ते को ढोते रहते हैं।

रिश्तों और प्रेम की कुछ इन्हीं बातों को मंगलवार को कालिदास रंगालय में मंचित नाटक आधे-अधूरे में दिखाया गया। मोहन राकेश के लिखे और सुबंती बनर्जी निर्देशित इस नाटक में हर पात्र अपनी जिंदगी और रिश्तों में संपूर्णता की तलाश में रहता है लेकिन बदकिस्मती से वह आधे-अधूरे ही रह जाता है।

नाट्य संस्था जाेगांजली, पटना की प्रस्तुति यह नाटक जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों को बयां कर गया। नाटक का पात्र महेन्द्रनाथ सावित्री से बहुत प्रेम करता है और सावित्री भी उसे बेहद चाहती है। लेकिन शादी के बाद सावित्री को महेंद्रनाथ से वितृष्णा होने लगती है क्योंकि उसे जीवन से अनंत अपेक्षाएं हैं। संपूर्ण पुरुष संग जीवन बिताने की मन में इच्छा लिए वह महेंद्रनाथ, जगमोहन, सिंघानिया, जुनेजा और मनोज से गुजरती फिर भी अधूरी रह जाती है। इधर महेंद्रनाथ सावित्री के पुरुष मित्रों से कुढ़ कर अपने आत्मसम्मान को बचाने के प्रयास में अधूरा है। उनकी बड़ी लड़की घर की परिस्तिथयों से लाचार मनोज के संग ब्याह कर घर से निकल जाती है परंतु वह भी खुद को अधूरी ही महसूस करती है। बड़ा लड़का ऐसे मोड़ की तलाश में है कि उसे भी घर की विषम परिस्थितियों से छुटकारा मिले। छोटी लड़की को मां, पिता, भाई और बहन किसी से भी लगाव नहीं है, पिता की बेकारी, मां की पुरुष मित्रों से नजदीकी, बड़ी बहन का घर से निकल जाने की वजह से वह लोगों की की कुत्सित बातें सुन बौखलाती है और वह भी जीवन में एक अधूरेपन को महसूस करती है। नाटक आधुनिक और महत्वाकांक्षा से भरी जीवनशैली में पारिवारिक विघटन को दिखाता है।

यह थे कलाकार

मृत्युंजयप्रसाद, सुबंती बनर्जी, अनुपमा पांडेय, प्रीति सिन्हा, अभिषेक चौहान, क्षितिज प्रकाश, सुमन कुमार, अभिषेक शर्मा।

हर किरदार संपूर्णता की चाह में अधूरा ही रह गया

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