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पटनामें पुस्तक सं

5 वर्ष पहले
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किताबों के कारण ही बनी देशभर में पहचान

र|ेश्वरसे बातचीत के क्रम में पता चलता है कि वह मीडिया के शिक्षक भी रह चुके हैं। देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर जाते रहे हैं। पत्रकारिता पर आई इनकी किताब समाचार एक दृष्टि के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से पत्रकारिता साहित्य का भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार मिल चुका है। पत्रकारिता से लेकर साहित्य में इन्होंने 17 किताबें लिखी हैं, जिसमें चर्चित कहानी संग्रह लेफ्टिनेंट हडसन भी शामिल है। 2013 में आई इनकी किताब जीत क
पटनामें पुस्तक संस्कृति के विकास के लिए एक शख्स वर्षों से लगा है। चाहे अपनी किताबों से पाठकों के दिल में जगह बनानी हो या पटना पुस्तक मेले को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ना, इस क्षेत्र में काम के आधार पर एक नाम सहज उभर आता है- र|ेश्वर। कई चर्चित पुस्तकों के लेखक र|ेश्वर से राजेंद्र नगर रोड नंबर-1 स्थित आवास पर भेंट हुई तो साहित्य से लेकर संस्कृति तक के क्षेत्र में इनके योगदानों को नजदीक से समझने का मौका लगा।

घर के ड्राइंग रूम में हमारी भेंट होती है। इसी कमरे में किताबों की विस्तृत दुनिया देखकर सहज ही अंदाजा हो जाता है कि र|ेश्वर ने साहित्य की विविध विद्याओं में कितना अध्ययन किया है। बातचीत के क्रम में हमें पता चलता है कि कई बेस्ट सेलर किताबों के इस लेखक ने लंबे संघर्ष के बाद अपनी पहचान बनाई है। आज एक लेखक और संस्कृतिकर्मी के तौर पर पहचान बनाने वाले र|ेश्वर ने बेहद ही कम उम्र में पिता के देहांत के बाद खेती किसानी भी की है। दिल खोल कर हंसने वाले र|ेश्वर सकारात्मक उर्जा से माहौल को खुशनुमा बना देते हैं।

बचपनमें ही कहा जाता था पाटलिपुत्र का स्टोरी मास्टर

शुरुआतकी बात निकली तो र|ेश्वर कहते हैं कि स्कूली शिक्षा पटना के सर गणेशदत्त पाटलिपुत्र हाईस्कूल में हुई। स्कूली दिनों में ही कहानी सुनाने की प्रतिभा के कारण शिक्षक स्टोरी मास्टर के नाम से बुलाते थे। 10वीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए नागपुर गया। हिसलॉप कॉलेज नागपुर से स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही 1988 में पहली कहानी वहां के एक बड़े अखबार में छपी। कहानी आैर लेखनी से प्रभावित होकर अखबार ने अपने यहां बतौर ट्रेनी सब एडिटर के तौर पर रख लिया। लेकिन, पारिवारिक स्थितियां ऐसी बनीं कि बनते कॅरियर को छोड़कर 1990 वापस पटना आना पड़ा।

अौर एक लेखक खुद अपनी किताब बेचने को खड़ा हो गया

चाय-पानीके बीच र|ेश्वर उस वाकये को बताना नहीं भूलते जब 1990 में पटना पुस्तक मेला लगा था- मैंने मेले के आयोजकों से मिलकर निवेदन किया कि दिशा नाम से एक किताब छपवाई है, जिसे आप किसी स्टॉल पर रखवा दें। किताब मेले में सज तो गई, लेकिन लोग आते और देखकर आगे बढ़ जाते। इसके बाद इसे खुद बेचने का फैसला लिया और मेले में आने वालों को किताब खरीदने के लिए कहने लगा। इस तरह से मेले के दौरान करीब साढ़े सात सौ किताबें बेच दी।

बचपन के स्टोरी मास्टर ने साहित्य संस्कृति को सौंप दिया अपना जीवन

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