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... रे तू नेता कि हम?

5 वर्ष पहले
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जल्द दिखेगा बड़े साहब का बड़ा गुस्सा

साथ भी हैं, अलग भी हैं

समाजसेवा, इसका दायरा

पद लेने की सुपारी

ये सबसे बड़े साहब हैं। इनका सबकुछ बाकी से बहुत बड़ा-बड़ा है। बड़ा पद। बड़ा घर। बड़ी गाड़ी। बड़ा वेतन। हंसी बड़ी है, तो गुस्सा भी बड़ा होगा। फिलहाल गुस्से की तैयारी और इसकी वजह जानिए। अभी एक बड़ा आयोजन हुआ। इसमें बड़े साहब, सबसे बड़े हिस्सेदार की हैसियत रखते थे। यही कायदा है। लेकिन उनको नहीं बुलाया गया। क्यों, तहकीकात जारी है। खैर, बड़े साहब से जुड़ी बड़ों की जमात ने इसे अपमान के रूप में नोट किया है। इसके कारगर जवाब की तैयारी है। बड़े साहब के क्षेत्राधिकार वाले संस्थानों, इसके समारोह या जुटान के मौकों से राजनीतिक कार्यपालिका, खासकर मंत्रियों को दूर रखने की रणनीति पर काम शुरू है। बहुत जल्द यह सब खुलेआम होगा।

ये एक पार्टी के दो अध्यक्ष जी हैं। एक दिल्ली वाले। एक पटना वाले। आजकल दोनों शायद ही एकसाथ दिखते हैं। दोनों, अपनों को समझाते हैं-सब नार्मल है। अपनों को बहुत कुछ एबनार्मल दिखता है। वजह, एक व्यक्ति एक पद का बताया जा रहा है। दिल्ली वाले अध्यक्ष जी दो पद पर हैं। पटना वाले ऐसा नहीं चाहते।

समाजसेवा, बस समाजसेवा नहीं है। समाज या सामाजिक प्राणियों की सेवा तक सीमित नहीं है। राजपाट की राजनीति ने इसके दायरे को बहुत विस्तारित कर दिया है। इतना कि इसके दायरे में कला, संस्कृति, विज्ञान ..., यानी सबकुछ है। यह कितना मुनासिब है, इसको तय करने की जिम्मेदारी हाईकोर्ट के पास पहुंची हुई है। कोर्ट, एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इसमें समाजसेवा के दायरे को विस्तारित करके बड़े घर में बारह लोगों के बैठने के इंतजाम को चुनौती दी गई है। एक बैठकी में कोर्ट के संभावित रूख पर बात चल रही थी। अंतिम राय यही आई कि बिल्कुल निश्चिंत रहना है। चाहे कला-संस्कृति हो या विज्ञान, सेवा तो समाज की ही होती है न!

यह नए तरह की सुपारी है। यह जान नहीं, पद लेने के लिए दी जाती है। सबसे पुरानी पार्टी का यह पुराना चलन इधर सामने आया है। इसमें ज्यादातर पार्टी के बिहारी सूरमा हैं। सुपारी लेने वाले भी, सुपारी देने वाले भी। एक सुपारी लेने वाले को जानिए। इनका नाम पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे उस शख्स से मिलता है, जो घोर भारत विरोधी रहे हैं। दिल्ली में पड़े रहते हैं। पार्टी के बिहारी कर्णधारों को जिस भी बिहारी पदधारक, खासकर अध्यक्ष को हटवाना होता है, तो वे इन्हें सुपारी यानी, खर्चा-पानी दे देते हैं। इनका एक ही काम है-किसी की तब तक शिकायत करना, जब तक कि वह चलता नहीं कर दिया जाए। आजकल इनका धंधा, रंग नहीं दिखा रहा। विधानसभा चुनाव का परिणाम, पार्टी की स्टेट कमेटी के लिए अभेद्य सुरक्षा कवच बना है।

नेता जी, विधायक हैं। डीजीपी से मिलने गए थे। सीढ़ी पर चढ़ने के दौरान उनका बॉडीगार्ड उनसे आगे हो गया। नेता जी ने उसे डपटा-रे तू नेता कि हम? चल पीछे। बेचारा गार्ड, बॉडी से सहम गया। देखे, सिर्फ चुनाव में ही नेता पीछे होता है। जीतने के बाद हमेशा आगे रहता है। पूरे खानदान के साथ आगे बढ़ते जाता है।

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