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इंडो-इस्लामिक कला का नमूना पत्थर की मस्जिद

सुल्तानगंजऔर आलमगंज के बीच अशोक राजपथ पर स्थित पत्थर की मस्जिद इंडो- इस्लामिक कला का एक अद्भुत शाहकार है। यह...

Dainik Bhaskar

Jun 08, 2016, 02:15 AM IST
इंडो-इस्लामिक कला का नमूना पत्थर की मस्जिद
सुल्तानगंजऔर आलमगंज के बीच अशोक राजपथ पर स्थित पत्थर की मस्जिद इंडो- इस्लामिक कला का एक अद्भुत शाहकार है। यह मस्जिद पत्थरों से बनी है इसलिए इसे संगी मस्जिद भी कहा जाता है। वैसे इसका नाम सैफ खान की मस्जिद और चिम्मी घाट की मस्जिद भी है। पटना की यह सबसे पुरानी मस्जिद है। इसका निर्माण लगभग चार सौ साल पहले 1621 में हुआ था। इसे मुगल बादशाह जहांगीर के बेटे परवेज शाह ने बनवाया था। परवेज उस वक्‍त बिहार-बंगाल का गवर्नर था। गंगा के किनारे और हरमंदिर तख्त साहब के पास स्थित पत्थर की मस्जिद पिछले चार सौ साल से धार्मिक सौहार्द का मिसाल पेश करता रहा है। मुगलकाल में गंगा से आने वाले राजा यहां का भ्रमण करते थे। अंग्रेजों का भी यहां आना- जाना रहा। विदेश के पर्यटक भी इसे देखने को आते थे।

रमजान के पहले दिन मंगलवार को सब्जीबाग में रोजा तोड़ते रोजेदार।

प्यास की तड़प डिगा नहीं सकी रोजेदारों को

पटना|रमजानकेपहले रोजे में मंगलवार की सुबह बादलों का डेरा रहा लेकिन दोपहर में तेज धूप निकल आई। धूप की वजह से प्यास का अहसास होने लगा। लेकिन प्यास और भूख की तड़प रोजेदारों के जज्बे को डिगा नहीं सका। बच्चों से लेकर बुजुर्गों ने पहला रोजा रखा। शाम में इफ्तार का लोगों ने लुत्फ उठाया। दोपहर बाद से ही महिलाएं इफ्तार के व्यंजनों को बनाने में जुट गईं। मगरिब की अजान होने के पहले ही इफ्तार के आइटमों को दस्तरखान पर रखा गया। उसके बाद रोजेदारों ने अल्लाह तआला से हाथ उठाकर दुआएं मांगीं। अजान होने के बाद लोगों ने खजूर पानी से रोजा खोला और फिर मौजूद व्यंजनों को खाया और परवरदिगार का शुक्रिया अदा किया। रमना रोड, सब्जीबाग, लालबाग, आलमगंज, शाहगंज, दानापुर, फुलवारीशरीफ के अलावा पटना विवि के छात्रावासों आदि में रहने वाले छात्रों ने खुद से इफ्तार बनाया। घरों से कुरआन के तिलावत की आवाज आने लगी। महिलाओं बच्चों ने घर में ही नमाज तिलावत किए तो पुरुषों ने नजदीक के मस्जिदों में जाकर नमाज अदा कीं। शहर के हरेक मस्जिदों में पांचों वक्त की नमाज में नमाजियों की भीड़ देखी गई। जिन लोगों ने बीमारी या अन्य कारणों से रोजा नहीं रखा, उन्हें इस बात का मलाल हो रहा था कि अल्लाह ने उन्हें सेहत से मजबूर कर दिया।

रविवार को रमजान का चांद नजर आया तो उसी वक्त हमने रोजा रखने का फैसला कर लिया। घर वालों को नहीं बताया। रोजा रखने के लिए रातभर नहीं सोया। इंतजार कर रहा था कि कब सेहरी खाने के लिए घर वाले उठेंगे। रात ढाई बजे जब सेहरी खाने के लिए अब्बू - अम्मी, दादा- दादी, चाचा-चाची उठे तो मैं भी उठ गया। अब्बू-अम्मी ने कहा सो जाओ, क्यों उठे हो। मैंने कहा कि मंगलवार को पहला रोजा है। मैं सात साल का हो गया हूं। अपनी जिंदगी का पहला रोजा रखूंगा। उमरअब्दुल्लाह, गुलिस्तांमुहल्ला, फुलवारीशरीफ

मैं दस साल की उम्र से रोजा रख रखी हूं। रोजा रखने के बावजूद कभी भी पढ़ाई पर इसका असर नहीं होने दिया। पति तुफैल अनवर की गोविंद मित्रा रोड में दवा की दुकान है। पति, बच्चों और सास घर के अन्य लोगों की खिदमत करते हुए कभी रोजे काे बीच में नहींं आने दी। घर में खाना बनाने में भी लगी रहती हूं। अल्लाह का शुक्र हैं कि सभी काम करते रोजा चल रहा है। मंगलवार को भी रोजा रखी। अल्लाह से दुआ करती हूं कि जब तक जिंदा रहूं, रोजा रखती रहूं। बच्चे भी रोजा रखने लगे हैं।

सूफियानाज, शिक्षिका,मध्य विद्यालय, इसोपुर, फुलवारीशरीफ

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