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सरफ़रोशी...नज़्म लिखने वाले की तमन्ना रही अधूरी

गैरकाहे को सुनेंगे तेरा दुखरा बिस्मिल। उनको कहां फुर्सत है अपनी गजल गाने से।। किसीकासामान चोरी हो जाता है तो...

Dainik Bhaskar

Aug 17, 2015, 04:10 AM IST
सरफ़रोशी...नज़्म लिखने वाले की तमन्ना रही अधूरी
गैरकाहे को सुनेंगे तेरा दुखरा बिस्मिल।

उनको कहां फुर्सत है अपनी गजल गाने से।।

किसीकासामान चोरी हो जाता है तो खोजकर उसे दे दिया जाता है। मेरे साहित्य की भी चोरी हो गई है। पता नहीं यह मेरे नाम वापस कब होगी। बिस्मिल ने अपनी दिल की हसरत इन शब्दों में एक परिचित की मैयत में आए वामिक जौनपुरी से कही थी। जौनपुरी ने अपनी किताब ‘गुफ्तनी ना गुफ्तनी’ में इसका जिक्र किया है। किताब 1972 के आसपास प्रकाशित हुई। इसके प्रकाशन के लगभग छह साल बाद तक बिस्मिल जीवित भी रहे, लेकिन जीते-जी उनकी यह ख्वाहिश पूरी हो सकी। उनकी मृत्यु के बाद कई रिसर्चरों ने यह साबित कर दुनिया को बताया कि अपनी जिस रचना के बारे में वह बात करते थे, वह सचमुच में उनकी ही है। आजादी के 69वीं वर्षगांठ पर भी बिस्मिल को सरकारी तौर पर वह हक नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। देश की सरकार तो दूर, बिहार की भी किसी सरकार ने जरूरत नहीं समझी कि

सरफरोशीकी तमन्ना

अब हमारे दिल में है,

देखना है जोर कितना

बाजू-ए- कातिल में है

केरचनाकार बिस्मिल अजीमाबादी को मरणोपरांत ही वाजिब सम्मान दिया जाए। यह स्थिति तब है, जब इस नज़्म को नारे के रूप में अपनाने वाले शहीद रामप्रसाद बिस्मिल को पूरा देश इस वजह से भी याद करता है। इंकलाबी शायर बिस्मिल अजीमाबादी उर्फ सैयद शाह मोहम्मद हसन उर्फ शाह झब्बू के परिजन आज भी एक अदद सड़क का नाम इस अमर गीत के रचनाकार के नाम पर करवाने की ख्वाहिश रखते हैं।

आजादी के 68 साल पूरे हो चुके और बिस्मिल अजीमाबादी के इंतकाल को भी लगभग 37 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आलम है कि गिने-चुने शायारों और रिसर्चरों तक ही इस जानकारी का प्रसार है कि इस गीत के मूल रचनाकार पटना के ही बिस्मिल अजीमाबादी थे। रमना रोड में रहने वाले बिस्मिल अजीमाबादी के पोते सैयद शाह मोनव्वर हसन इसका कारण सरकार की नीतियों को मानते हैं। उनका कहना है छोटी-छोटी उपलब्धियां हासिल करने वालों के नाम पर भवन तक बना दिए गए, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों में ऊर्जा फूंकने वाली नज़्म के रचनाकार को सरकार ने भुला रखा है।

खुदाबख्श़ लाइब्रेरी ने प्रकाशित कराई किताब

बिस्मिलअजीमाबादी की ज्यादातर रचनाएं गायब हो चुकी हंै। जो बची थीं, उन्हें खुदाबख्श लाइब्रेरी के सहयोग से साल 1980 में हेकायत-ए-हस्ती के नाम से प्रकाशित किया गया था।

76 में हार्ट अटैक 78 में हुई मौत

साल1976 में इन्हें हर्ट अटैक आया। इसके बाद वे लकवाग्रस्त हो गए हैं। घटना के बाद उन्होंने लोगों को पहचानना छोड़ दिया था। दो साल बाद जून 1978 को इन्होंने आखिरी सांस ली। इन्हें पैतृक क्षेत्र खुसरूपुर में दफनाया गया।

मरते दम तक रहा मुशायरे से संबंध

उससमय पटना मुशायरे का बहुत बड़ा केंद्र था। कोई भी ऐसा कुलीन परिवार नहीं था, जिसमें एक भी शायर हो। शाद अजीमाबादी सबके प्रेरणास्रोत थे। इनके शिष्यों में कई नामचीन शायर शुमार थे। ये सब लगातार मुशायरे का आयोजन करते थे। बिस्मिल भी इनमें पूरी जोश के साथ जीवनपर्यंत भाग लेते रहे। उनकी शायरी में ज्यादातर सूफी का भाव था, जो उन्होंने हरदासबीघा के प्राकृतिक वातावरण में रहकर हासिल किया था।

1921 में की थी रचना

बिस्मिलअजीमाबादी ने सरफरोशी की तमन्ना... 1921 में लिखी। इसी वर्ष पहली दफा इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया भी। इसके बाद इसे प्रकाशित करने के लिए दिल्ली की एक उर्दू पत्रिका के संपादक के पास भेज दिया। कुछ ही प्रतियां बिकने के बाद पूरे देश में इसका नशा छा गया। बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह गीत चढ़ गया। गुस्साए अंग्रेजों ने पत्रिका के संपादक काजी अब्दुल गफ्फार और कवि के नाम अरेस्ट वारण्ट जारी कर दिया। इसके बाद वे बचते-बचते पटना गए। उन्हें पुलिस से बचाने के लिए घरवालों ने पुलिस से झूठ बोला था कि 21 वर्ष की उम्र का कोई लड़का ऐसा गीत लिख ही नहीं सकता। तब जाकर पुलिस ने उनका पीछा छोड़ा। इस वाकये के बाद उनका इंकलाबी शायरी से नाता टूट गया और वे सूफी शायरी और गजलों की ओर रुख कर गए। इनके परनाती सैयद मसूद हसन ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए अपने साक्षात्कार में भी इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने आगे कहा था कि, चूंकि राम प्रसाद बिस्मिल ने अनेक मंचों से गा-गाकर इस गीत को प्रसिद्ध कर दिया था, इसलिए यह उनका ही कलमबद्ध किया माना जाने लगा।

मोनव्वर हसन

मोनव्वर हसन ने दर्जनों ऐसे सबूत संजोए हुए हैं, जिनसे साबित होता है कि यह रचना उनकी ही है। इस सबूतों में ज्यादातर रिसर्च पेपर हैं। कुछ पत्रिकाएं भी हैं, जिसे बिहार उर्दू अकादमी, खुदाबख्श़ लाइब्रेरी आदि ने प्रकाशित किया था। सबूत के तौर पर सबसे पहले उन्होंने उस कागज की छायाप्रति दिखाई जिसपर बिस्मिल अजीमाबादी ने सरफरोशी की तमन्ना... लिखी थी। कागज पर उनके गुरु शाद अजीमाबादी के द्वारा किया गया सुधार भी मौजूद है। इसके बाद उन्होंने बिहार राजभाषा विभाग की ओर से प्रकाशित उर्दू साहित्य के विकास में बिहार विभूतियों का योगदान, दिल्ली उर्दू अकादमी की ओर से प्रकाशित धर्मेंद्र नाथ की पुस्तक, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखक अली सरदार जाफरी का लेख आदि सहित कई साक्ष्यों को दिखाया। इनमें डॉ. इकबाल अहमद की ओर से बिस्मिल पर किया सबसे पहला रिसर्च वर्क बिस्मिल अजीमाबादी: फ़न और शख्सियत भी शामिल है।

बिस्मिल अजीमाबादी के नाम एक अदद सड़क भी नहीं

उनकी दो संतान हैं जिंदा

बिस्मिल की शादी इनके मंझले चाचा सैयद शाह मज़हर हसन की बेटी हसीना खातून से हुई। हसीना खातून ने पांच बेटों सैयद शाह अहमद हसन, सैयद शाह मेंहदी हसन, सैयद शाह हादी हसन, सैयद शाह हामिद हसन एवं सैयद शाह जमाल हसन और तीन बेटियों हुमायरा खातुन, शमीमी खातून और आमना खातून को जन्म दिया। आठ संतानों में से अब केवल दो संतान हामिद हसन और आमना खातुन जिंदा है।

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