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मेरी विनती

5 वर्ष पहले
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कवि और धनवान आदमी

मां शारदा

बदलता समय

दिन एक कवि किसी धनी आदमी से मिलने गया और उसे कई सुंदर कविताएं इस उम्मीद के साथ सुनाईं कि शायद वह धनवान खुश होकर कुछ इनाम जरूर देगा। लेकिन वह धनवान महाकंजूस था। बोला, “तुम्हारी कविताएं सुनकर दिल खुश हो गया। तुम कल फिर आना, मैं तुम्हें खुश कर दूंगा।”

‘कल शायद अच्छा इनाम मिलेगा।’ ऐसी कल्पना करता हुआ वह कवि घर पहुंचा और सो गया। अगले दिन वह फिर उस धनवान की हवेली में जा पहुंचा। धनवान बोला, “सुनो कवि महाशय, जैसे तुमने मुझे अपनी कविताएं सुनाकर खुश किया था, उसी तरह मैं भी तुमको बुलाकर खुश हूं। तुमने मुझे कल कुछ भी नहीं दिया, इसलिए मैं भी कुछ नहीं दे रहा, हिसाब बराबर हो गया।”

कवि बेहद निराश हो गया। उसने अपनी आप बीती एक मित्र को कह सुनाई और उस मित्र ने बीरबल को बता दिया। सुनकर बीरबल बोला, “अब जैसा मैं कहता हूं, वैसा करो। तुम उस धनवान से मित्रता करके उसे खाने पर अपने घर बुलाओ। हां, अपने कवि मित्र को भी बुलाना मत भूलना। मैं तो खैर वहां मैंजूद रहूंगा ही।”

कुछ दिनों बाद बीरबल की योजनानुसार कवि के मित्र के घर दोपहर को भोज का कार्यक्रम तय हो गया। नियत समय पर वह धनवान भी पहुंचा। उस समय बीरबल, कवि और कुछ अन्य मित्र बातचीत में मशगूल थे। समय गुजरता जा रहा था लेकिन खाने-पीने का कहीं कोई नामोनिशान था। वे लोग पहले की तरह बातचीत में व्यस्त थे। धनवान की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, जब उससे रहा गया तो बोल ही पड़ा, “भोजन का समय तो कब का हो चुका ? क्या हम यहां खाने पर नहीं आए हैं ?”

“खाना, कैसा खाना ?” बीरबल ने पूछा।

धनवान को अब गुस्सा गया, “क्या मतलब है तुम्हारा? क्या तुमने मुझे यहां खाने पर नहीं बुलाया है ?”

खाने का कोई निमंत्रण नहीं था। यह तो आपको खुश करने के लिए खाने पर आने को कहा गया था।” जवाब बीरबल ने दिया। धनवान का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, क्रोधित स्वर में बोला, “यह सब क्या है? इस तरह किसी इज्जतदार आदमी को बेइज्जत करना ठीक है क्या? तुमने मुझसे धोखा किया है।”

अब बीरबल हंसता हुआ बोला, “यदि मैं कहूं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं तो…। तुमने इस कवि से यही कहकर धोखा किया था ना कि कल आना, सो मैंने भी कुछ ऐसा ही किया। तुम जैसे लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए।”

धनवान को अब अपनी गलती का आभास हुआ और उसने कवि को अच्छा इनाम देकर वहां से विदा ली।

वहां मौजूद सभी बीरबल को प्रशंसा भरी नजरों से देखने लगे।

(अकबर-बीरबलकी कहानी से साभार)

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बहुत खुशी होती मुझे, इस पर्व के आने से। वीणा की झंकार में छिपे, बुद्धि-विवेक-खजाने से।

ज्ञान का प्रकाश हैं देवी, धरा प्रकाशमान है। मनन शक्ति के लिए, मांगते हम वरदान हैं।

छिपे गहरे राज में, गजब-गजब के गीत हैं। संगीत-कला की देवी, विद्या की प्रतीक हैं।

ब्रह्मा की मानस पुत्री, ज्ञान-प्राप्ति की कामना। मां सरस्वती की तो, करते विशेष उपासना।

सम्राट समीर

पटना

मेहनत करना भुल गए ईमानदारी को छोड़ गए सोचकर पागल हो गए सही राह को खो गए

महंगाई तो नांच रही भूखमरी तो बढ़ रही पार्टी तो घूम रही गरीबों को भूल रही

आसमान तो जल रहा पाप की आग उगल रहा गाड़ी-मोटर तो बढ़ रहे हर आंगन में सज रहे

सासों में धुआं भर रहा, राह-राह चलने लगे, गाड़ी से राह भरने लगे।

पुराने रिस्ते तोड़ पड़े, नए रिस्ते तो जोड़ पड़े।

प्रताप कुमार

पटना

जय मां सरस्वती, हमें भी ज्ञान दो। हम अबोध बालक हैं,| थोड़ा हम पर ध्यान दो।

पढ़ाई में लगाकर मन, बदले अपने आपको। पढ़ने की जिज्ञासा, जागे हम सब को।

है हाथ में कलम, कापी, किताब भी। जलाओ उद्यम का दीप, लूं ज्ञान-खिताब भी।

हम अबोध बालक को, जरूरी सिर्फ ज्ञान है। पढ़ना तो हम चाहें, लगता ध्यान है।

विनती मेरी यह तू, सुन मां सरस्वती। ज्ञान के दीप से, लगाओ मुझे आरती।

प्रवीण कुमार

पटना

प्रतिभा भारती

खगौल, पटना

बेद प्रताप

पटना

आदित्य राज

पटना

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