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सिफारिश से नियुक्त 184 शिक्षिकाएं होंगी बर्खास्त, 36 साल पहले मिली थी नौकरी

5 वर्ष पहले
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पटना. सीबीआई की जांच रिपोर्ट पर सेवानिवृत्ति की कगार पर खड़ी 184 महिला शिक्षकों को शिक्षा विभाग बर्खास्त करने जा रहा है। ये वो शिक्षिकाएं हैं, जिन्हें नियमों को ताक में रखकर नेताओं की लिखित अनुशंसा पर ऐसे नियुक्त कर दिया गया, जैसे राजनीतिक दल पार्टी में पदाधिकारी नियुक्त करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नियुक्ति के वक्त इन शिक्षिकाओं की न उम्र देखी गई, न शैक्षिक योग्यता। जानिए कौन थे सिरफारिश करने वाले नेता...
- तीन माह की अस्थायी नियुक्तियां आगे चलकर अवैध तरीके से वैध हो गई। शिक्षा के इतिहास में देश का पहला मामला है, जिसमें 184 शिक्षिकाओं को एक साथ बर्खास्त किया गया हो।
- मामला 1980-98 के बीच नियुक्त हुए 305 महिला शिक्षकों का था, जिनमें से 184 के कागजात ही सीबीआई को मिले। इन सबकी नियुक्ति में गड़बड़ी की रिपोर्ट सीबीआई ने वर्ष 2004 में ही दे दी।
- 70 शिक्षक झारखंड चली गई थीं और बाकी का रिकॉर्ड ही नहीं मिल सका। यानी, कुल गड़बड़झाला 305 महिला शिक्षकों की नियुक्ति है। अनुशंसा करने वाले नेताओं में तीन पूर्व मुख्यमंत्री समेत कई नेता हैं।
- सीबीआई ने अनियमित नियुक्तियों को शिक्षा विभाग के सिस्टम का दोष माना है और अपनी अनुशंसा में जिन महिला शिक्षकों की नियुक्ति अनियमित मानी।
- उनके खिलाफ और उन्हें नियुक्त करने वाले अफसरों पर डायरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन को समुचित कार्रवाई करने की बात कही है। सरकार को शिक्षकों की नियुक्ति मामले में सिस्टम में सुधार के सुझाव भी दिए गए।
- अनियमित नियुक्ति करने वाले कुल 46 लोग थे। इनमें सर्वाधिक 108 नियुक्तियां शांति उपाध्याय और 57 नियुक्तियां सुधा सिन्हा ने कीं।
- नियुक्त करने वालों में से जांच शुरू होने के पूर्व ही 8 की मौत हो गई। 41 सेवानिवृत्त हो चुकीं थीं। सिर्फ 5 सेवा में थीं, जिनके जरिए सिर्फ 16 नियुक्तियां हुई थीं।

हाईकोर्ट गए तब सामने आया मामला

- सुषमा कुमारी गोप और चार अन्य प्राथमिक शिक्षकों ने 1997 में 20 जुलाई 1985 से 17 मई 1990 की अवधि का पे-बेनिफिट क्लेम करते हुए हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया।
- यहां बता दें कि निम्न अवर शिक्षा सेवा, लोअर सबार्डिनेट एजुकेशन सर्विस के 159 शिक्षकों को 9 जुलाई 1991 को विभिन्न तिथियों से भूतलक्षी प्रभाव से अवर शिक्षा सेवा में प्रोन्नत किया गया था।
- प्रोन्नति आदेश में साफ लिखा था कि प्रोन्नत शिक्षकों को 20 जुलाई 1985 से 17 मई 1990 के बीच की पे-बेनिफिट वित्त विभाग की सहमति के बाद ही मिलेगा।
- प्रोन्नति के कारण होने वाले वित्तीय लाभ में देरी हो रही थी, इसी कारण शिक्षकों ने 1997 में हाईकोर्ट में मुकदमा किया।
- सुनवाई के क्रम में सरकार की ओर से डाइरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन ने अदालत में जवाब दिया कि 1980 के बाद महिला शिक्षकों की नियुक्ति अनियमित हुई, लिहाजा उन्हें दी गई प्रोन्नति भी अनियमित है।
- मामले की निगरानी जांच चल रही है। इसी मामले की सुनवाई के क्रम में हाईकोर्ट ने 19 सितंबर 1997 को आदेश पारित किया कि पदोन्नत शिक्षकों को वेतन वृद्धि का लाभ देने के संबंध में सरकार दो महीने के भीतर निर्णय ले। - सरकार ने इस दो महीने की अवधि में छूट हासिल कर ली और इसी बीच डाइरेक्टर सेंकेडरी एजुकेशन ने मंत्रिमंडल निगरानी विभाग से 1980-1998 के बीच नियुक्त 300 शिक्षकों और 160 प्रोन्नत शिक्षकों के मामले की जांच की शिकायत दर्ज की।
- निगरानी जांच चल ही रही थी कि ब्रजेश कुमार बनाम अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 1998 को पूरे मामले को सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई ने 2004 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी।
पहले 3 माह के लिए अस्थायी नौकरी, फिर कर दिया स्थायी

- निम्न अवर शिक्षा सेवा के शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में डाइरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन और डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्ट्रेस ऑफ स्कूल ही सक्षम पदाधिकारी होते थे।
- इमरजेंसी में इंस्पेक्ट्रेस ऑफ स्कूल को तीन माह के लिए ही किसी शिक्षक को नियुक्त करने का अधिकार था।
- बीपीएससी की ओर से विज्ञापित नियुक्तियों को छोड़कर सभी नियुक्तियां नियोजनालयों के मार्फत होनी चाहिए थी।
- लेकिन नियमों का अनुपालन नहीं हुआ। वैसी रिक्तियों के विरुद्ध भी अस्थायी नियुक्तियां कर लीं, जो किसी शिक्षक के मातृत्व अवकाश, बीमारी या लंबी छुट्टी पर जाने से पैदा हुई थीं।
- 3 माह के लिए की जाने वाली अस्थायी नियुक्तियों में सेवा विस्तार का प्रावधान नहीं है, पर दिया गया।
न विज्ञापन निकला, न ही चयन समिति बनी, सीधे नियुक्ति पत्र

- नियुक्तियों में स्थापित नियमों का अनुपालन हुआ ही नहीं। न तो अखबारों में विज्ञापन निकला, न ही रिक्तियों को नियोजनालयों के जरिए भरा गया। न ही कोई सेलेक्ट कमेटी बनी। न ही रोस्टर का अनुपालन हुआ।
- जिनकी अनुशंसा हुई, उन्हें सीधे नियुक्ति पत्र दे दिए गए। जो अनट्रेंड टीचर थे, उन्हें पहले लोअर स्केल पर नियुक्त किया गया और ट्रेनिंग के बाद उन्हें प्रशिक्षित शिक्षक का पे-स्केल दे दिया।
- रिपोर्ट कहती है कि बिहार एजुकेशन कोड का अनुच्छेद 97(xi) डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्ट्रेस ऑफ स्कूल को वर्ग-4 के सरकारी सेवक व शिक्षकों की नियुक्ति का अधिकार देता है।
- वह भी वैसे कन्या स्कूलों के मामले में जिसे सरकार ने अधिगृहीत किया हो। नियुक्ति में इसी अधिकार की गलत व्याख्या की गई है।
12 साल तक करते रहे टालमटोल, कई सेवानिवृत्त हो गए
- सीबीआई की वर्ष 2004 की रिपोर्ट पर 2006 में कार्रवाई के लिए शिक्षिकाओं की सूची बनाने का काम शुरू हुआ। वर्ष 2014 तक यह सूची ही तैयार होती रही।
- उसी साल माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने सभी प्रमंडलों को शिक्षिकाओं की सूची भेजी। वर्ष 2016 में हाईकोर्ट ने फिर पूछा कि पुराने मामले में क्या किया गया? तब जाकर बर्खास्तगी के आदेश जारी होने लगे।
इन नेताओं ने की थी सिफारिश
- डॉ जगन्नाथ मिश्रा (पूर्व सीएम)।
- लालू प्रसाद (पूर्व सीएम)।
- डॉ सीपी ठाकुर (सांसद)।
- जयप्रकाश यादव (सांसद)।
- किशोरी सिन्हा (पूर्व सांसद)।
- तारिक अनवर (सांसद)।
- रघुनाथ झा (पूर्व सांसद)।
- रामदेव राय (विधायक)।
(अनुशंसा करने वाले दिवंगत नेताओं के नाम नहीं दिए जा रहे हैं।)
भर्ती करने वाले अफसरों पर भी होगी कार्रवाई
सीधी बात : माध्यमिक शिक्षा निदेशक राजीव सिंह रंजन से
- आरोपित शिक्षिकाओं पर कार्रवाई 12 साल बाद क्यों हो रही है?
-आरोपित शिक्षिकाओं को बर्खास्त करने की कार्रवाई मैंने पद पर आते ही शुरू कर दिया है। सभी आरडीडीई को बर्खास्तगी के आदेश जारी किए गए हैं।
- अब तक कितनी शिक्षिकाओं पर बर्खास्तगी की कार्रवाई हुई?
- प्रमंडलों से कार्रवाई का विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया है। स्कूलों से समन्वय स्थापित कर कार्रवाई हो रही है। विभाग के पास विवरण आने दें।
- नियुक्ति करने वाले पदाधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी क्या?
- जो भी दोषी हैं, बख्शे नहीं जाएंगे। अफसरों की भी सूची बन रही है। अधिकांश रिटायर हो चुके हैं। उनपर क्या कार्रवाई हो, विचार चल रहा है।
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