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कर्ज के मर्ज में भूले मां-बाप का फर्ज

6 वर्ष पहले
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देवेन्द्र तिवारी > पटना 8651992992

हैदराबादसेछुड़ा कर लाए गए ज्यादातर बच्चे गया, नालंदा, नवादा, जहानाबाद और भागलपुर के हैं। इनसे बातचीत में सामने आया कि सुदूरवर्ती इलाकों के गरीब मां-बाप ही अपने बच्चों को मौत के मुंह में झोंक रहे हैं। घरेलू कलह, दूसरी शादी, दोनों के कमाने के लिए बाहर जाने के कारण मां-बाप ही बच्चों को दलालों के हाथों सौंप दे रहे हैं। छुड़ाए गए बच्चों में जिनके मां-बाप से संपर्क हो पाया, उनमें ज्यादातर ने माली हालत खराब होने को कारण बताया। कुछ ने बताया कि बेटी की शादी में लिए कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने अपने बच्चे को बाहर कमाने के लिए गांव के लड़कों के साथ भेजा था। कुछ ने तो खाना-खर्च के कारण कर्ज बढ़ने पर बच्चे को बाहर भेज दिया। खास बात यह भी कि महज हजार, दो हजार रुपए प्रति माह के लिए इन्हें दलालों के हवाले कर दिया गया था। इन बच्चों में कुछ बच्चों को एक बार छुड़ाए जाने के बाद दूसरी बार उनके परिजनों ने ही बाहर भेजा था।

औसतन आठ से 12 साल के बीच के इन बच्चों में कई तो अपने गांव का नाम भी नहीं जानते हैं। इनमें कुछ तो छह साल के आसपास के हैं। स्टेशन पर जब इनसे गांव का नाम पूछा गया तो बिहार बताते हुए इधर उधर देखने लगे। उन्होंने बताया कि रिश्तेदारों ने ही कुछ लोगों के साथ हैदराबाद भेजा था। कई बच्चे तो यह तक नहीं बता पा रहे थे कि आखिर वह कहां से रहे हैं। बातचीत में सामने आया कि एक गांव से दो-तीन बच्चे गए थे और ज्यादातर एक साथ ही हैदराबाद ले जाए गए। वहां उन्हें चूड़ी उद्योग में काम के लिए झुग्गी में रखा जाता था। वहां पहुंचने के बाद ज्यादातर बच्चों का उनके मां-बाप से संपर्क कभी नहीं हुआ था। उनके मां-बाप ने भी बच्चों से संपर्क करने की कोशिश की, ऐसी बात सामने नहीं आई। बच्चों ने बताया कि वहां उनसे चूड़ी में नगीना और मीनाकारी का काम कराया जाता था। काम की वजह से कई बच्चों के उंगलियों में निशान बन गए हैं। इनसे करीब 14-15 घंटे तक काम कराया जाता था। इन बच्चों में दो से तीन एक ही गांव के हैं और इनमें ज्यादातर मुस्लिम या एससी-एसटी हैं। हिन्दी भाषी होने की वजह से बिहार आए कुछ बच्चे झारखंड के रहने वाले भी हैं।

चमकके लिए खो रहा है बचपन

पहलेज्यादातर बच्चों को पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी से छुड़ाया जाता था, जहां इनका उपयोग खेती के लिए बंधुआ मजदूर के रूप में किया जाता था। लेकिन, पिछले साल भर में भारी संख्या में बिहार के बच्चों को जयपुर, बेंगलुरू, दिल्ली और मुंबई से छुड़ाया गया। इन बच्चों से चूड़ी उद्योग, साड़ियों में मीनाकारी, जरी स्टोन और नगीना से जुड़े काम कराए जाते थे। उद्योगों में महीन कारीगरी के लिए छोटे और मुलायम हाथों की जरूरत होती है। इस जरूरत के लिए उद्योग मालिक दलालों को प्रति बच्चे 4 से छह हजार रुपए तक मुहैया कराते हैं। मेट्रो शहरों के यह दलाल बिहार के दूरदराज ग्रामीण इलाकों में फैले अपने सूत्रों से संपर्क करते हैं। दलाल सबसे पहले गांव के किसी एक लड़के को बाहर भेजता है और उसके एवज में उनके माता-पिता को हजार से दो हजार रुपए देता है।

हैदराबाद से छुड़ाए बच्चों का दर्द

यहां भी दर्ज कराएंगे मामला

^हैदराबादमें बच्चों के मामले में मानव तस्करी समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। बच्चों से बातचीत के आधार पर यहां भी दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। कई बच्चे काफी छोटे हैं, उनसे घर आदि के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है।

इमामुद्दीनअहमद निदेशक, समाज कल्याण निदेशालय

रोजाना चार बच्चे होते हैं गायब

नेशनलक्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने साल 2013 में बच्चों के अपहरण के कुल 28167 मामले दर्ज किए। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार से रोजाना चार बच्चे गायब होते हैं। साल 2013 में प्रदेश भर से 18 साल से कम उम्र के कुल 1180 बच्चे गायब हुए थे। इनमें से मात्र तीस फीसदी बच्चे ही लौटकर पाते हैं। गायब होने वाले बच्चों में ज्यादातर संख्या लड़कियों की होती है। यही नहीं प्रदेश में बच्चों पर अपराध के 1580 मामले दर्ज किए गए। इनमें 101 बच्चों की हत्या, 86 बच्चियों से रेप, 1180 का अपहरण, लड़की बेचने के तीन, कम उम्र में शादी का एक और अन्य 64 मामले दर्ज किए गए। लड़कियों के लौटने के मामले कम होते हैं।

केस| तीन

इनबच्चों में शामिल नवादा के 12 वर्षीय बच्चे के परिजन ने बताया कि उनके मामा जी ने बच्चे को काम पर भेजा था। बाद में उन्हें पता चला कि बच्चे की मां ने ही पैसे के लालच में उसे गांव के अन्य लड़कों के साथ भेज दिया था। इसमें मामा ने अहम भूमिका निभाई।

केस| दो

राजगीरजिले से गए बच्चे के लेबर का काम करने वाले परिजन ने बताया कि उन्होंने बेटी की शादी में महाजन से कर्ज लिया था। माली हालत ठीक नहीं होने और कर्ज चुकाने के लिए अपने बच्चे को काम के लिए बाहर भेजा था।

केस| एक

हैदराबादसे छुड़ाए गए नालंदा के 13 वर्षीय बच्चे के परिजनों ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने पहले बच्चे को हॉस्टल में डाला था। वहां से वह भाग आया। बाद में लोकल स्कूल में दाखिले के बाद भी उसने पढ़ाई नहीं की। तब बच्चे को काम के लिए भेज दिया।

पटना जंक्शन पर बुधवार की रात पटना-सिकंद्राबाद ट्रेन से आए बच्चों की यह तस्वीर देखकर कौन कह सकता है कि इन्हें खतरनाक उद्योगों में लगाया जाना चाहिए। ऐसी तीन खेप लगातार छूट कर हैदराबाद से पटना अाई। और, सभी की कहानी लगभग एक जैसी है।

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बच्चों को जयपुर से छुड़ाया गया था। इन बच्चों से जरी, चूड़ी, इम्ब्रायडरी उद्योग में काम लिया जा रहा था।

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बच्चे दिसंबर के दूसरे सप्ताह में मुंबई रेलवे स्टेशन से छुड़ाए गए थे। इन्हें मजदूरी के लिए ले जाया गया था।

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बच्चे हैदराबाद में चूड़ी फैक्ट्री के आसपास से मुक्त कराए गए। बच्चों से जरी का काम कराया जाता था।

पैसे से भरोसा जमाते ताकि और बच्चे आएं

शुरुआतमें समय पर पैसा भेजकर दलाल भरोसा जमाते हैं और इसी बहाने गांव के अन्य बच्चों के परिजनों को भी अपने साथ भेजने पर राजी कर लेते हैं। बच्चों को ले जाने के कुछ माह बाद परिजनों को देरी से रुपया देने लगते हैं। दलालों की निगाह सबसे ज्यादा ऐसे परिवार पर रहती है, जहां गरीब माता या पिता ने दूसरी शादी कर ली हो। ऐसे में उन्हें राजी करने में काफी आसानी होती है। बच्चे भी घर की प्रताड़ना की वजह से घर से जाने से आसानी से राजी हो जाते हैं। बच्चों को लाने-जाने के क्रम में कई बार कुछ बच्चे स्टेशन आदि पर छूट भी जाते हैं। दलाल बाद में इन बच्चों का अता-पता भी नहीं लगाते हैं।

अप्रैल 2014- बेंगलुरू की बैंगल्स फैक्ट्री, अगस्त 2014- दिल्ली, आखिरी दिसंबर- मुंबई स्टेशन और अब हैदराबाद की चूड़ी फैक्ट्री। तारीख और बच्चों की संख्या बदल रही है, लेकिन ज्यादातर बार छुड़ाए बच्चे बिहार के निकल रहे। बच्चों को छुड़ाकर बिहार लाया जाता है, लेकिन कुछ समय बीतने के बाद यह दोबारा मौत के मुंह में भेजे जा रहे। यह जानते हुए भी कि इनके साथ अमानवीय व्यवहार होता है। तीन दिनों तक हैदराबाद से कुल 265 बच्चों को पटना लाया गया। तीनों दिन डीबी स्टार ने इन बच्चों का दर्द समझा और रेस्क्यू से जुड़े अफसरों से बात की। लब्बोलुआब यही निकला कि बेटी की शादी या खाना-खर्च के कारण कर्ज का मर्ज बढ़ने पर मां-बाप ने लालन-पालन का फर्ज भूल इन्हें कमाई के लिए भेज दिया।

शादी और खाना खर्च के लिए भेज देते हैं बच्चे

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