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पप्पू यादव की प्राथमिकता

7 वर्ष पहले
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और अंत में

डॉक्टरों की फीस तय करने की सांसद पप्पू यादव की मांग पर कड़ी प्रतिक्रियाएं रही हैं। खुद पप्पू यादव ने कहा है कि व्यक्तिगत बातचीत में तो लोग मेरी मांग को जायज बता रहे हैं, पर मेरे तरीके को गलत बता रहे हैं। संभव है कि पप्पू यादव को कुछ बेहतर तरीके बताए जा रहे होंगे। पर, एक तरीके की चर्चा यहां भी कर देना मौजूं होगा। आजादी के बाद इस राज्य के अनेक नेताओं ने अनेक डिग्री काॅलेजों की स्थापना कराई। कुछ निजी मेडिकल काॅलेज भी खुले। बाद में उनका सरकारीकरण हो गया। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में तो वहां के कई नेताओं ने बड़ी संख्या में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की स्थापना की और कराई। पप्पू यादव भी एक प्रभावशाली नेता हैं। उन्हें चाहिए कि वे राज्य में निजी मेडिकल काॅलेज खोलने या खोलवाने के काम में अपनी शक्ति का सदुपयोग करें। क्योंकि, बिहार में चिकित्सकों की बड़ी कमी है। मेडिकल क्षेत्र का निजी व्यवसाय भी डिमांड और सप्लाई के आधार पर ही चलता है। यदि राज्य में योग्य चिकित्सकों की संख्या बढ़ेगी, तो फीस में भी कमी सकती है। डॉक्टरों के साथ जोर-जबर्दस्ती करने के बदले पप्पू यादव क्यों नहीं मेडिकल काॅलेजों की संख्या बढ़वाने में अपनी ताकत का उपयोग करते हैं?

समस्याकी जड़

एकआकलन के अनुसार यदि सरकार के एक करोड़ रुपए घोटाले में चले जाते हैं, तो इसी के साथ 10 लोगों को स्थायी रोजगार देने की संभावना भी समाप्त हो जाती है। सरकारी खजाने से 10 करोड़ रुपए की चोरी के परिणामस्वरूप सरकारी अस्पतालों के जरिए सौ गरीब मरीजों की मुफ्त चिकित्सा की गुंजाइश खत्म हो जाती है। सरकारी खजाने से 100 करोड़ रुपए की लूट के कारण हजार लोगों के छोटे-बड़े अपराध की दुनिया में चले जाने की भूमिका तैयार हो जाती है। इसलिए, पप्पू यादव जैसे ताकतवर नेता को चाहिए कि वे डॉक्टरों को अपने टारगेट में लेने के बदले सरकारी भ्रष्टाचार पर चोट करें। उससे इस तरह की कई अन्य समस्याएं भी कम हो जाएंगी। सरकारी अस्पतालों में ही ठीक ढंग से गरीबों को उचित चिकित्सा की सुविधा मिल जाए, तो फिर कितने मरीज निजी चिकित्सालयों में जाएंगे?

एकसकारात्मक पहल

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