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माछ-भात के साथ खूब जमलई साहित्यिक गोष्ठी

7 वर्ष पहले
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शनिवारकोयूथ हॉस्टल में पूरा का पूरा मिथिलांचल उतर पड़ा था। एक तरफ माछ भात खाने और खिलाने की होड़ सी लगी थी। तो दूसरी तरफ मैथिली साहित्य पर चर्चा हो रही थी। यह सब यहां हो रहा था मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन, जहां मिथिला की संस्कृति की मनमोहक छटा चारों ओर बिखरी पड़ी थी। दरभंगा से तालाब से निकाली गई मछली आयोजन में खाने के लिए विशेष रूप से मंगवाई गई थी। बेहद ही स्वादिष्ट बनी इस मछली की खुशबू दूर से ही रही थी। वहीं पूरा परिसर मैथिली हस्तशिल्प, मिथिला पेंटिंग, मैथिली खान पान और साहित्य की किताबों के स्टॉल से सजा हुआ था। इस दौरान विधायक विनोद नारायण झा, कवि शशि बोध मिश्र शशि, आयोजन समिति के नरेन्द्र झा, विनोद कुमार झा, अशोक, श्याम दरिहरे, उषा किरण खान, समेत मिथिला क्षेत्र की जानी मानी सैकड़ों हस्तियां मौजूद थी।

हुईमैथिली साहित्य पर परिचर्चा

मैथिलीलिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन शनिवार को यहां होने वाली परिचर्चा के तहत सबसे पहले मैथिली में बाल साहित्य पर चर्चा की गई। इसमें मैथिली साहित्यकार प्रवीण भारद्वाज ने कहा कि बच्चों के साहित्य को लोग दोयम दर्जे का साहित्य मानते हैं। इसलिए लेखक इसकी उपेक्षा करते हैं, वहीं अगर बांग्ला साहित्य में देखे तो पाते हैं कि वहां लेखक बिना बाल साहित्य के बड़ा लेखक नहीं बन सकता है। इसमें नारायण जी ने भी अपने विचार व्यक्त किए जबकि मंच का संचालन ऋषि वशिष्ठ ने किया।

इसके बाद के कार्यक्रम मैथिली पोथी प्रकाशन वितरण में मैथिली पुस्तकों के बाजार पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसमें शरदेंदु चौधरी, कमलेश झा ने भाग लिया और यह बात निकल कर आई कि जब तक मैथिली समाज के लोग अपनी आदतों में पुस्तक खरीदना शामिल नहीं करेंगे तब तक लेखक का कल्याण नहीं हो सकता। इसलिए हर परिवार अपने मासिक बजट में से कुछ हिस्सा पुस्तकों के लिए रखे। साथ ही लेखकों को भी पुस्तकों की गुणवत्ता का ख्याल रखना चाहिए।

हमनाटक देखब

मैथिलीलिटरेचर फेस्टीवल में उदय नारायण सिंह के नाटक नो इंट्री पर हम नाटक देखब कार्यक्रम के तहत चर्चा की गई। इसमें दीपक गुप्ता ने कहा कि यह मैथिली के श्रेष्ठ नाटकों में से एक है। वहीं रमेश रंजन ने कहा कि यह नाटक जन रुचि का नाटक है जिसके जरिये बड़ा सामाजिक संदेश देने की कोशिश की गई है। इसके साथ ही फेस्टिवल में राजकमल चौधरी की जयंति पर उनको श्रद्धांजलि देने