काम का ब्योरा नहीं दे रहे अधिकारी
महात्मागांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में लूट मची हुई है। लोकसेवा के अधिकार के तहत टेंडर का ब्योरा मांगने पर भी सरकारी अधिकारी गैर सरकारी संगठनों को जवाब नहीं देते हैंं। जमीन पर काम नहीं होने के बावजूद पैसा आवंटित हो जाता है। मजदूरों का जॉब कार्ड सरकारी अधिकारियों से संरक्षण पाने वाले ठेकेदारों के पास हैं। ये बातें मंगलवार को गैरसरकारी संगठनों ने एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट में सामजिक अंकेक्षण पर आयोजित परिचर्चा के दौरान ग्रामीण विकास विभाग के सचिव एसएम राजू से कहीं।
गैरसरकारी संगठनों ने कहा कि प्रत्येक साल गैरसरकारी संस्थानों द्वारा सामजिक अंकेक्षण कराया जाता है। लेकिन, विभाग ने अभी तक मनरेगा में लूट मचाने वाले अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों पर कोई कार्रवाई नहीं की। कार्रवाई होती तो गलत करने वाले अधिकारियों जनप्रतिनिधियों में डर पैदा होता।
इस मौके पर भारत सरकार के सामजिक अंकेक्षण सलाहकार गुरुजीत सिंह, पैक्स के स्टेट प्रोग्राम मैनेजर आरती कुमारी, ग्रामीण विकास विभाग के सामाजिक अंकेक्षण पदाधिकारी सुवेंद सान्याल सहित राज्य के विभिन्न जिलों से आए लगभग 30 गैरसरकारी संगठनों के सदस्य उपस्थित थे।
फरवरीसे होगा सामाजिक अंकेक्षण
फरवरीमाह से राज्य के सभी 38 जिलों के 200 पंचायतों में गैर सरकारी संगठनों द्वारा सामजिक अंकेक्षण शुरू किया जाएगा। इससे पहले विभाग के वरीय अधिकारी दिसंबर एवं जनवरी माह में सर्वेक्षण करने वाले गैरसरकारी संगठनों को प्रशिक्षण देंगे। अभीतक पंचायत रोजगार सेवक सामजिक अंकेक्षण करते थे। जिनके सर्वे को ग्रामीण विकास विभाग ने अवैध करार दे दिया है।
मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी पांच जगहों से पैसा गुजरने के बाद मिलती है। इस वजह से कई बार काम खत्म होने के महिनों बाद तक मजदूरों का पैसा बकाया रह जाता है। काम करने के लिए मनरेगा का पैसा पहले जिला विकास पदाधिकारी (डीडीसी), प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ), पंचायत रोजगार सेवक (पीआरएस), मुखिया एवं काम करने वाले ठेकेदार के पास जाता है, फिर मजदूर को मिलता है।