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जीव चिकित्सा अपशिष्टों का 48 घंटे में हो निपटारा

6 वर्ष पहले
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सभीशहरों में जिस प्रकार से जीव चिकित्सा अपशिष्ट बढ़ता जा रहा है उसे कंट्रोल करने के लिए तेजी से जीव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन की ओर ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए राज्य के सभी सरकारी और प्राइवेट स्वास्थ्य केंद्रों, नर्सिंग होम, अस्पताल के प्रतिनिधियों को खुद से बेहतर योजना तैयार करनी चाहिए।

ये बातें होटल चाणक्या में सोमवार को आयोजित कार्यशाला में बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अध्यक्ष डॉ. सुभाष चंद्र सिंह ने कही। वे मर्करी एवं जीव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन विषय पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि पटना, मुजफ्फरपुर और भागलपुर में सामूहिक जीव चिकित्सा अपशिष्ट उपचार एवं निपटारे की व्यवस्था स्थापित है। गया में भी जल्द ही यह व्यवस्था शुरू हो जाएगी। उन्होंने सभी स्वास्थ्य केंद्रों को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की जानकारी प्राप्त करने की बात कही है। प्रदूषण नियंत्रण परिषद के वैज्ञानिक डॉ. नवीन कुमार ने कहा कि सभी स्वास्थ्य केंद्रों से निकलने वाले जीव चिकित्सा अपशिष्टों को 48 घंटे के अंदर ही निपटारा किया जाना चाहिए। निपटारे के लिए डीपबुरियल, इंसीनरेशन, माइक्रोवेविंग, ऑटो क्लेविंग आदि प्रक्रिया इस्तेमाल किया जाना जरूरी है। टॉक्सिक लिंग नई दिल्ली के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा ने कहा कि अस्पतालों को मर्करी रहित बनाने की दिशा में तेजी से काम करने की जरूरत है। मर्करी युक्त थर्मामीटर, ब्लड प्रेशर मापक यंत्र का उपयोग नहीं होना चाहिए।

तकनीकका प्रयोग हो

सीडॉनके जेनरल सेक्रेटरी राकेश शरण ने कहा कि उनका एनजीओ सभी हॉस्पिटलों में जाकर बायो मेडिकल वेस्ट को बेहतर प्रबंधन के लिए लोगों को जागरूक करता है। इस तरह के अपशिष्ट को हॉस्पिटल से ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाने के दौरान मॉनिटरिंग के लिए तकनीक का प्रयोग किया जाना चाहिए। इससे लोगों को जानकारी मिल सके कि इस तरह के वेस्ट से दूरी बनाकर रख सकें। कार्यक्रम में मेडिकेयर मुजफ्फरपुर के क्षेत्रीय प्रबंधक राजीव कुमार, मोहित भाटिया, कंकणा दास, राकेश शरण आदि उपस्थित थे।

कार्यशाला में (बाएं से) डॉ. नवीन कुमार, सतीश सिन्हा, डॉ. सुभाष चंद्र सिंह और कंकणा दास।